Srishti Khanda Extracted Page 699

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-699

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Sanskrit Original

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन नित्यं कर्माणि कारयेत् । नारद उवाच किमर्थं च जलं तात देवाः पितृगणैः सह ॥६८॥ न प्राप्ठवंति सर्वज्ञ लभंते मानवा यथा । ब्रह्मोवाच पुरा सृष्टं मया तोयं सर्वदेवमयामृतम् ॥६९॥ तस्यैव रक्षणार्थं च रक्षा यक्षा धनुर्धराः । घ्नंति ते पितरं देवमस्मद्दाक्यान्न मानुषम् ॥७०॥ पशवः पक्षिणः कीटा मर्त्यलोके व्यवस्थिताः । मर्त्यजाताश्च देवा ये तथैव मानुषा ध्रुवम्॥७१॥ तर्पयित्वा गुरुं नित्यं सुरलोके प्रतिष्ठिताः । अस्नायी च मलं भुंक्ते अजपी पूयशोणितम् ॥७२॥ अकृत्वा तर्पणं नित्यं पितृहा चोपजायते । ब्रह्महत्या समं पापं देवानामप्यपूजने ॥७३॥ सन्ध्याकृत्यमकृत्वा च सूर्यहंति च पापकृत् । नारद उवाच ब्राह्मणस्य सदाचारक्रमं ब्रूहि च कर्मणाम् ॥७४॥ इतरेषां च वर्णानां प्रवृत्तमखिलं वद । ब्रह्मोवाच आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते सुखम् ॥७५॥ आचारात्स्वर्गमोक्षं च आचारो हंत्यलक्षणम् । अनाचारो हि पुरुषो लोके भवति निंदितः ॥७६॥ दुःखभागी च सततं व्याधितोल्पायुरेव च । नरके नियतं वासो ह्वानाचारान्नरस्य च ॥७७॥ आचाराच्च परं लोकमाचारं शृणु तत्त्वतः । गोमयेन गृहे नित्यं प्रकुर्यादुपलेपनम् ॥७८॥ करने वाला स्वर्ग लोक जाता है । गमनागमन, काम, मोक्ष तथा सुख आदि को स्थिर करके वह स्वर्ग जाता है॥६७॥ अतएव प्रयास पूर्वक नित्य कर्मों को करना चाहिए । नारदजी ने कहा-- हे सर्वज्ञ ! मनुष्यों के समान देवता तथा पितृगण अपने से जल को क्यों नहीं प्राप्त करते हैं ब्रह्माजी ने कहा-- सृष्टि के प्रारम्भ में मैने सर्वदेवमय अमृत जल की रचना की ॥६९॥ उसकी रक्षा के लिए धनुर्धारी यक्षों एवं राक्षसों को मैंने नियुक्त किया । मेरी आज्ञा के अनुसार देवता और पितरों को वे मारते हैं, किन्तु मनुष्यों को नहीं ॥७०॥ पशु, पक्षी, कीट ये मर्त्यलोक में रहने वाले हैं। जो देवता संसार में उत्पन्न होकर देवता हो जाते हैं वे भी मनुष्य ॥७१॥ उन गुरुजनों का नित्य तर्पण करके देवलोक में प्रतिष्ठित होते हैं । स्नान नहीं करने वाला मल खाता है, विना जप किए खाने वाला रक्त खाता है।॥७२॥ प्रतिदिन तर्पण नहीं करने वाला पितृघाती होता है । देवताओं की पूजा नहीं करने से ब्रह्महत्या के समान पाप होता है॥७३॥ संध्या नहीं करने वाला पापी सूर्य का हनन करता है । नारदजी ने कहा-- आप ब्राह्मण के सदाचार को क्रमशः बतलाइये ॥७४॥ दूसरे वर्णो के भी कर्मा का आप मुझे बतलायें । ब्रह्माजी ने कहा-- आचार से आयु की प्राप्ति होती है तथा आचार से सुख की प्राप्ति होती है ॥७५। आचार से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है, आचार का पालन करने से सभी दोष विनष्ट हो जाते हैं । आचार का पालन नहीं करने वाले पुरुष की लोक में निन्दा होती है ॥७६॥ वह सदा दुःखी रहता है, रोगी होता है तथा वह अल्पायु हो जाता है । अनाचार के कारण मनुष्य का निश्चित रूप से नरक में वास होता है ॥७७॥ आचार से परलोक की प्राप्ति होती है, अतएव तुम आचार का स्वरूप Pees Tos

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