Srishti Khanda Extracted Page 698
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-698
Sanskrit Original
ततोदशगुणेनैव तुष्यंति पितरो धुवम् । स्नानं संध्यां च पाषाणे खड्गे वा ताम्रभाजने।५ ३॥ तर्पणं कुरुते यस्तु प्रत्येकं च शताधिकम् । रौप्यांगुलीयं तर्जन्यां धृत्वा तत्तर्पयेत्पितृन्॥५४॥ सर्वच शतसाहस्रगुणं भवति नान्यथा । तथैवानामिकायां तु धृत्वास्वर्णागुलीं बुधः ॥५५॥ तर्पयेत्पितृसंदोहं लक्षकोटिगुणं भवेत् । अंगुष्ठदेशिनीमध्ये सव्यहस्तस्यखड्गकम् ॥५६॥ धृत्वानामिकयारत्नमंजलेरक्षयं फलम्। स्नानार्थमभिगच्छतं देवाः पितृगणैः सह॥५७॥ वायुभूतानुगच्छंति तृषार्ता: सलिलार्थिनः । निराशास्ते निवर्तते वस्त्रनिष्पीडनेन च ॥५८॥ तस्मान्नपीडयेदसत्रमकृत्वा पितृतर्पणम् । तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे॥५ ९॥ स्रवंतिसर्वतीर्थानि तस्मान्न परिपीडयेत्। देवाः पिबंति शिरसि शमश्रुतः पितरस्तथा ॥६०॥ चक्षुषोरपिगंधर्वा अधस्तात्सर्वजंतवः । देवाः पितृगणाः सर्वे गंधर्वाजंतवस्तथा ॥६१॥ स्नानमात्रेण तुष्यंति स्नानात्पापं न विद्याते। नित्यस्नानं च च यः कुर्यात्स नरः पुरुषोत्तमः॥६ २॥ ` सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो नाकलोके महीयते । स्नानं तर्पणपर्यंतं देवामहर्षयोविदुः ॥६ ३॥ अतः परं च देवानां पूजनं कारयेद् बुधः । गणेशं पूजयेद्यस्तु विध्नस्तस्य न जायते ॥६४॥ आरोग्यार्थं च सूर्य च धर्ममोक्षाय माधवम्। शिवं च कृत्यकामार्थं सर्व कामाय चंडिकाम्॥६ ५॥ देवांस्तु पूजयित्वा तु वैश्वदेवबलिंचरेत् । वह्विकार्यं ततः कृत्वा यज्ञ ब्राह्मणतर्पणम्॥६६॥ देवानां सर्वसत्त्वानां पुनस्त्रिविष्टपं ब्रजेत् । गतागतं स्थिरं कृत्वा कामान्मोक्षं सुखंदिकम् ॥६७॥ है । सूखे वस्न से पवित्र स्थान में जो पितरों का तर्पण किया जाता है ॥५२॥ उससे दश गुना पितरों की तृप्ति होती है । स्नान और सन्ध्या पाषाण पर अथवा खड्ग पर या ताम्बे के पात्र में जो किया जाता है ॥५३॥ उससे सौ गुना फल होता है । तर्पण के समय चाँदी की अङ्गूठी तर्जनी अङ्गुली में धारण करके पितरों का तर्पण करना चाहिए॥५४॥ ऐसा करने से तर्पण का फल हजारों गुना होता है । उसी तरह अनामिका अङ्गुलि में सुवर्ण की अङ्गूठी धारण करके॥५५॥ विद्वान् को तर्पण करना चाहिए । ऐसा करने से तर्पण का लाख करोड़ गुना फल होता है । दाहिने हाथके अङ्गूठे और तर्जनी अङ्गुलि के मध्य में विद्यमान स्थान को खड्ग कहते हैं ॥५६॥ अनामिका अङ्गुलि में रत्न धारण करने से अक्षय फल होता है । स्नान करने के लिए जाते समय देवता और पितृगण वायु रूप में प्यासे हुए उसके पीछे जाते हैं और वस्त्र गार लेने से वे निराश होकर लौट जाते हैं ॥५८। अतएव पितरों का तर्पण किए बिना वस्र को नहीं निचोड़े । मनुष्य के शरीर में साढे तीन करोड़ रोएँ होते हैं ॥५९॥ उन सबों से जल गिरता है अतएव उन सबों को नहीं पोछना चाहिए । शिर के जल को देवता पीते हैं, दाढी के जल को पितृगण पीते हैं ॥६०॥ नेत्रं से गिरने वाले जल को गन्धर्व पीते है और नीचे के रोओं से गिरे जल को दूसरे सभी जीव पीते हैं । देवता, पितृगण, गन्धर्व तथा दूसरे जीव ॥६१॥ केवल स्नान कर लेने से तुष्ट हो जाते हैं, अतएव स्नान कर लेने से पाप नहीं रह जाता है । जो प्रतिदिन स्नान करता है वह मनुष्य उत्तम पुरुष है ॥६२॥ सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग लोक में जाता है । तर्पण पर्यन्त स्नान को देवता और महर्षि जानते हें ॥६२॥ उसके पश्चात् विद्वान को देवताओं का पूजन करना चाहिए | गणेशजी की पूजा करने वाले को कोई विघ्न नहीं होता है ॥६४॥ अरोग्य की प्राप्ति के लिए सूर्य की पूजा करे, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति के लिए भगवान् माधव की पूजा करे । शिवजी की पूजा कृत्य काम के लिए करे और सभी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए चण्डिका की पूजा करे ॥६५॥ देवताओं की पूजा करके बलि वैश्वदेव करे । उसके बाद अग्निहोत्र करके यज्ञ तथा ब्राह्मणों को तृप्त करे ॥६६-६७॥ देवताओं और सभी जीवों को तृप्त
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