Srishti Khanda Extracted Page 697
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-697
Sanskrit Original
अग्निस्तंभभयाद्वेवा नचेच्छन्त्यतिविस्तरम् । स्नात्वा यस्तर्पयेन्नित्यं तिलमिश्रोदकैः पितृन् ॥३८॥ नीलषंडविमोक्षेण त्वमावास्यातिलोदकै: । वर्षासु दीपदानेन पितृणामनृणो भवेत् ॥३९॥ वत्सरैकममायां तु तर्पयेद्यस्तिलै: पितृन्। विनायकत्वमाप्रोति सर्वदेवैः प्रपूज्यते ॥४०॥ युगाद्यासु च सर्वासु यस्तिलैस्तर्पयोत्पितून् । उक्त यद्वाप्यमायां तु तस्माच्छतगुणाधिकम् ॥४ १॥ अयने विषुवे चैव राकामायां तथैव च । तर्पयित्वा पितृव्यूहं स्वर्गलोके महीयते॥४२॥ तथामन्वंतराख्यायामन्यस्यां पुण्यसंस्थितौ । ग्रहणे चंद्रसूर्यस्य पुण्यतीर्थे गयादिषु ॥४३॥ तर्पयित्वा पितृन्याति माधवस्य निकेतनम् । तस्मात्पुण्याहकं प्राप्य तर्पयेत्पितृसंचयम् ॥४४॥ तर्पणं देवतानां च पूर्वं कृत्वा समाहितः । अधिकारी भवेत्पञ्चत्पितृणां तर्पणे बुध: ॥४५॥ श्राद्धे भोजनकाले च पाणिनैकेनदापयेत् । उभाभ्यां तर्पणे दद्याद्विधिरेषसनातनः॥४६॥ दक्षिणाभिमुखो भूत्वा शुचिस्तु तर्पयेत्पितृन् । तृप्यतामितिवाक्येन नामगोत्रेण वै पुनः ॥४७॥ अकृष्णैर्यत्तिलै माहात्तर्पयेतूपितृसंचयम् । भूम्यां ददाति यदपो दाता च जलेस्थितः ॥४८॥ वृथा तद्दीयते दानं नोपतिष्ठति कस्यचित्। स्थलेस्थित्वा जले यस्तु प्रयछेदुदकं नरः ॥४९॥ नोपतिष्ठेत्पितृणां तु सलिलं तन्निरर्थकम् । आर्द्रासा जले यस्तु कुर्यादुदकतर्पणम् ॥५०॥ पितरस्तस्य तृप्यंति सह देवैस्सदानघ। रजकैः क्षालितं वस्त्रमशुद्धं कवयो विदुः ॥५१॥ हस्तप्रक्षालने चैव पुनर्वततरं तु शुध्यति । शुष्कवासाः शुचौ देशे स्थानेयत्तर्पयेत्पितृन् ॥५२॥ से भी अधिक स्वादिष्ट हो जाता है ॥३६॥ इसीलिए तपर्ण सदा तिल मिश्रित जल से करना चाहिए । दश तिलों से पितरों की उत्तम तृप्ति होती है ॥३७॥ अग्नि स्तम्भ के भय से देवता अत्यन्त विस्तार नहीं चाहते । जो स्नान करके प्रतिदिन तिल से पितरों का तर्पण करता है ॥३८॥ पितरों के लिए नीला सांढ छोड़ने से आमावस्या के दिन तिल के जल से तर्पण करने से तथा वर्षा के दिनों में दीपदान करने से मनुष्य पितृऋण से मुक्त हो जाता है ॥३९॥ जो व्यक्ति एकवर्ष तक आमावस्या के दिन तिल से पितरों का तर्पण करता है, वह विनायकत्व को प्राप्त करके सभी देवताओं से पूजित होता है ॥४०॥ जो व्यक्ति सभी युगादि तिथियों को तिल से पितरों का तर्पण करता है, वह अमावस्या के दिन किये गये तर्पण से सौ गुना अधिक होता है ॥४१॥ अयन के अवसर पर तथा विषुव के समय तक राका आमावस्या को पितरों का तर्पण करने वाला स्वर्गलोक में पूजित होता है उसी तरह मन्वन्तर तिथि को तथा दूसरी पुण्य तिथि को सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण के समय तथा गया आदि पुण्य तीर्थो में ॥४३॥ तर्पण करके मनुष्य श्रीभगवान् के लोक में जाता है । अतएव पुण्य दिनों को पितरों का तर्पण करना चाहिए ॥४४॥ सावधानी पूर्वक देवताओं का तर्पण करके विद्वान् पुरुष पितरों के तर्पण करने का अधिकारी होता है ॥४५॥ श्राद्ध में तथा भोजनकाल में एक हाथ से देना चाहिए और तर्पण में दोनों हाथों से तर्पण करना चाहिए यही सनातन विधि हैं ॥४६॥ पवित्र होकर दक्षिणाभिमुख होकर तर्पण करना चाहिए । तर्पण में नाम एवं गोत्र के उच्चारण पूर्वक वाक्य के अन्त में तृप्यताम् कहना चाहिए ॥४७॥ अज्ञानवशात् जो उजले तिल से पितृतपर्ण किया जाता है तथा जो जल में खड़ा होकर पृथिवी पर जल गिराया जाता है ॥४८॥ वह दिया गया जलदान व्यर्थ होता है, वह किसी को नहीं मिलता है जो मनुष्य पृथिवी पर रहकर जल में जल देता है ॥४९॥ वह भी जल पितरों को नहीं मिलता है, वह निरर्थक होता है जो भिंगे कपड़े से जल में जल का तर्पण किया जाता है हे अनघ उस जल से देवता और पितृगण तृप्त होते हैं । घोबी के द्वारा घोए गये वस्न को ऋषियों ने अशुद्ध बतलाया है ॥५०-५१॥ अपने हाथ से घो लेने पर वह वस्र शुद्ध होता
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