Srishti Khanda Extracted Page 696
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-696
Sanskrit Original
अतःपरं च पानीयं यावद्धिप्रहरत्रयम्। तत्परंलोहितं प्रोक्तं यावदस्तं गतो रविः ॥२४॥ चतुर्थप्रहरे स्नाने रात्रौ वा तर्पयेत्पितून् । तत्तोयं रक्षसामेव ग्रहणेन विना स्मृतम् ॥२५॥ पानीयं सर्वसिद्भ्यर्थंपुरैवनिर्मितं मया । रक्षार्थं तस्य तोयस्य यक्षाश्चैव धुरंधराः ॥२६॥ न प्राप्रुवंति पितरो ये चलोकांतरं गताः। दुष्प्राप्य सलिलं तेषामृते स्वान्मर्त्यवासिनः ॥२७॥ तस्माच्छिष्यैश्च पुत्रैश्च पौत्रदौहित्रकादिभिः । बंधुवर्गैस्तथाचान्यैस्तर्पणीयं पितृव्रतैः ॥२८॥ नारद उवाच जलस्य दैवतं ब्रूहितर्पणस्य विधिं मयि । यथा जानामि देवेश तत्वतो वक्तुमर्हसि॥२९॥ ब्रह्मोवाच जलस्य देवता विष्णुः सर्वलोकेषु गीयते। जलपूतो भवेद्यस्तु विष्णुस्तच्छंकरो भवेत् ॥३०॥ जलं गंडूषमात्रं तु पीत्वा पूतो भवेन्नरः । विशेषात्कुशसंसर्गात्पीयूषादधिकंजलम् ॥३९॥ सर्वदेवालयो दभो मयायं निर्मितः पुरा । कुशमूले भवेद्ृह्मा कुशमध्ये तु केशवः ॥३२॥ कुशाग्रे शंकरं विद्धि कुश एते प्रतिष्ठिताः । कुशहस्तः सदामेध्यः स्तोत्रं मंत्रं पठेद्यदि ॥३३॥ सर्व शतगुणं प्रोक्तं तीर्थे साहस्र मुच्यते। कुशाः काशास्तथादूर्वा यवपत्राणि व्रीहयः ॥३४॥ बल्वजाः पुडरीकाश्च कुशास्सप्त प्रकीर्तिताः। आनुपूर्व्येण मेध्याः स्युः कुशालोके प्रतिष्ठिताः ३५॥ विना मंत्रेण यत्स्नानं सर्व तन्निष्फलं भवेत्। अमृतात्स्वादुतामेति संस्पर्शाच्च तिलस्य च ॥३६॥ तस्माच्च तर्पयेन्न्त्यि पितृंस्तिलजलैर्बुधः। दशभिश्च तिलैस्तावत्पितृणां प्रीतिरुत्तमा॥ ३७॥ होता है ॥२२॥ उसके बाद डेढ प्रहर तक संध्या का जल दुग्ध के तुल्य हो जाता हे । उसके बाद चार दण्ड का दुर्ध मिश्रित के समान जल रहता है । उसके बाद तीन प्रहर तक जल जल रहता है । उसके पश्चात् सूर्यास्त तक संध्या का जल रक्त के तुल्य हो जाता है ॥२४॥ जो व्यक्ति चौथे प्रहर में स्नान करके पितरों का तर्पण करता है उसके द्वारा किए गये तर्पण का जल राक्षसों कोही प्राप्त होता है । किन्तु ग्रहण काल में ऐसा नहीं होता है ॥२५॥ मैंने पहले ही सभी कार्यो की सिद्धि के लिए पानी को बनाया है और उसकी रक्षा करने के लिए धुरन्धर यक्षों को नियुक्त किया ॥२६॥ लोकान्तर में गये हुए पितृगण अपने से जल को नहीं प्राप्त कर पाते हैं ।मर्त्यलोक वासी अपने सन्तानों के बिना पितरों को जल दुर्लभ होता है ॥२७॥ इसीलिए. पितरों की पूजा करने वाले शिष्यों, पुत्रों, पौत्रों, दौहित्रो, बान्थवो तथा दूसरे संबन्धियों को तर्पण करना चाहिए ॥२८॥ नारदजी ने कहा-- आप मुझे जल के देवताओं और उनके तर्पण की विधि को बतलायें जिससे कि हे देवेश ! मैं उन सबों को तत्त्वत: जान सकूँ ॥२९॥ ब्रह्माजी ने कहा-- सभी लोकों में जल के देवता विष्णु जाने जाते हैं जो जल से शुद्ध होता है भगवान् विष्णु उसका कल्याण करते हें ॥३०॥ गंडूष (कुल्ला) मात्र जल पीकर मनुष्य पवित्र हो जाता है । खासकर कुश के संसर्ग से जल अमृत जैसा पवित्र हो जाता है॥३१॥ कुश सभी देवताओं का आश्रय रूप से मेरे द्वारा बनाया गया है । कुश के मूल में ब्रह्माजी का निवास होता है, मध्य में भगवान् केशव का निवास होता है ॥३२॥ कुश के अग्रभाग में शङ्करजी का निवास होता है । कुश में ये सभी देवता प्रतिष्ठित हैं । अतएव हाथ में कुश लेकर ही यदि मन्त्र अथवा स्तोत्र पढा जाता है तो वह पवित्र होता है ॥३३॥ ऐसा करने से सब कुछ किया हुआ सौ गुना हो जाता है और तीर्थो में तो हजार गुना हो जाता है । कुश, काश, दुर्वा, यवका पत्ता, धान का पत्ता, बल्वज, तथा पुण्डरीक ये सातो कुश कहे गये हैं । ये पूर्व-पूर्व के क्रम से अधिक पवित्र होते हैं ॥३४-३५॥ मन्त्र के बिना किया गया स्नान निष्फल होता है । तिल के संस्पर्श से जल अमृत
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