Srishti Khanda Extracted Page 695
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-695
Sanskrit Original
% श्रीपद्ममहापुरण एतान्यस्तु स्मरेन्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः । ब्रह्माहत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥८॥ सकृदुच्चरिते तात सर्वयज्ञफलं लभेत् । गवां शतसहस्राणां दानस्य फलमश्नुते ॥९॥ ततश्चापि शुचौ देशे मलमूत्र परित्यजेत् । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ दिवा कुर्यादुदङमुखः ॥१०॥ परतो दंतकाष्ठं च तृणैरुदुंबरादिभिः। अतःपरं च संध्यायां संयतश्च द्विजो भवेत् ॥१९॥ पूवह्लि रक्तवर्णा तु मध्याह्ने शुक्लवर्णिकाम् । सायं सरस्वतीं कृष्णां द्विजोध्यायेद्य॒थाविधि ॥१२॥ ततः समा चरेत्स्नानं यथाज्ञानेन यत्मतः । अंगं प्रक्षालयित्वा तु मृद्धिः संलेपयेत्ततः ॥१३॥ शिरोदेशे ललाटे च नासिकायां हृदि भ्रुवोः । वाह्लोः पाश्वे तथानाभौ जान्वोरङ्ध्रिद्वये तथा ॥१४॥ एका लिगे गुदेतिस्रस्तथा वामकरे दश । उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥१५॥ अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे । मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसंचितम् ॥१६॥ अनेनैव तु मंत्रेण मृत्तिकां यस्तनौ क्षिपेत् । सर्वपापक्षयस्तस्य शुचिर्भवति मानवः ॥१७॥ ततस्तु वेदपूर्वेण स्नानं कुर्याद्विचक्षणः । नदे नद्यां तथा कूपे पुष्करिण्यां तटाकके ॥१८॥ जलराशौ च वप्रे च घटस्नानं तथोत्तरम् । कारयेद्विधिवन्मर्त्यः सर्वपापक्षयाय च ॥१९॥ प्रातः स्नानं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् । यः कुर्यात्सततं विप्रो विष्णुलोके महीयते ॥२०॥ प्रातः संध्यासमीपे च यावद्ंदंडचतुष्टय्। तावत्पानीयममृतं पितृणामुपतिष्ठते ॥२१॥ परतो घटिकायुग्मं यावद्यामैकमाह्विकम् । मधुतुल्यं जलं तस्मिन्पितृणां प्रीतिवर्धनम् ॥२२॥ ततस्तु सार्द्धयामैंक जलं क्षीरमयं स्मृतम्। क्षीरमिश्रं जलं तावद्यावद्दण्डचतुष्टयम् ॥२३॥ करता है, वह ब्रह्महत्या इत्यादि के पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥८॥ हे तात! इन सबों का एक बार उच्चारण करने से सभी यज्ञां के फल की प्राप्ति होती है वह सौ हजार गायों के दान का भी फल प्राप्त करता है ॥९॥ उसके बाद पवित्र स्थान में जाकर वह मल-मूत्र का परित्याग करे । रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर तथा दिन में उत्तराभिमुख होकर मलमूत्र का त्याग करे ॥१०॥ उसके बाद तृणों तथा गूलर इत्यादि के दातून से दतौन करे । उसके बाद मनुष्य संध्या करे । पूर्वाहण में ब्राह्मण रक्तवर्णा, मध्याह्न में शुक्लवर्णा तथा सायंकाल, कृष्णवर्णा संध्या का ध्यान करे ॥११-१२॥ उसके बाद ब्राह्मण अपने ज्ञानानुसार स्नान करे । पहले अड्डों को धोकर उसके बाद अड्डों में मिट्टी लगाये ॥१३॥ शिर में, ललाट में, नाक में, हृदय में दोनों भौहों पर, दोनों भुजाओं में, काँख में फिर नाभि में उसके बाद दोनों पैरों में मिट्टी लगाये ॥१४॥ लिङ्ग में एक बार, गुदा में तीन बार, बायें हाथ में दश बार, फिर दोनों हाथों में सात बार शुद्धि चाहने वाले को मिट्टी लगानी चाहिए ॥१५५॥ उस समय अश्वक्रान्ते इत्यादि मन्त्र को पढना चाहिए । मन्त्र का अर्थ हैं, हे अश्व क्रान्त, रथक्रान्त तथा विष्णुक्रान्त बसुन्धरे, मृतिके मेरे द्वारा संचित मेरे पापों का आप हरण करें ॥१६॥ इस मन्त्र के द्वारा जो अपने शरीर में मिट्टी लगाता है, उसके सभी पाप क्षीण हो जाते हैं, और वह मनुष्य पवित्र हो जाता है ॥१७॥ उसके बाद वेदमंत्र पूर्वक स्नान करे । स्नान नद, नदी, पुष्करिणी अथवा तालाब में करें ॥१८। अथवा रखे हुए जलराशि से, घट से स्नान सभी पापों के विनाश के लिए विधिपूर्वक करे ॥१९॥ प्रातःकाल का स्नान अत्यन्त पवित्र तथा सभी पापों का नाशक होता है । जो ब्राह्मण निरन्तर प्रातःकाल स्नान करता है, वह विष्णु लोक में पूजित होता है ॥२०॥ जब तक प्रात:काल चार घड़ी रात्रि रहती है, उस समय संध्या का जल अमृत के समान होता है ओर पितरों को प्राप्त होता है ।।२१॥ उसके बाद की दो घड़ी तक यानी एक याम (पहर) तक जो आहिक कृत्य, किया जाता है उसका जल पितरों को मधु के तुल्य प्राप्त
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