Srishti Khanda Extracted Page 694

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-694

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Sanskrit Original

सकृच्च श्रावयेद्यस्तु कथां पुण्यतमामिमाम्। सर्वपापक्षयस्तस्य देवैश्च सह मोदते ॥१९४॥ य इदं शृणुयाद्वापि परं पुण्यतमं महत्। सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते तत् क्षणेन हि ॥१९५॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गोमाहात््यं नामाष्टचत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४८॥ — ie उनचासवों अध्याय नारद उवाच केनाचारेण विप्रस्य ब्रह्मतेजो विवर्धते । केनाचारेण तस्यैव ब्राह्मं तेजो विनश्यति ॥१॥ ब्रह्मोवाच शयनीयात्समुत्थाय रत्र्यंशे द्विजसत्तमः । देवांश्चैवस्मरेन्नित्यं तथा पुण्यवतो ध्रुवम् ॥२॥ गोविंदं माधवं कृष्णं हरिं दामोदरं तया । नारायणं जगन्नाथं वासुदेवमजं विभुम् ॥३॥ सरस्वतीं महालक्ष्मी सावित्रीं वेदमातरम् । ब्रह्माणं भास्करं चन्द्रंदिकपालांश्च ग्रहांस्तथा ॥४॥ शङ्करं च शिवं शंभुमीश्वरं च महेश्वरम् । गणेशं च तथा स्कन्दं गौरीं भागीरथीं शिवम्॥५॥ पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको जनार्दनः । पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः ॥६॥ अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चीरजीविनः ॥७॥ जो मनुष्य किसी को इस पवित्रतम कथा को सुनाता है, उसके सभी पापों का क्षय हो जाता है तथा वह देवताओं के साथ आनन्दानुभव करता है ॥१९४॥ जो मनुष्य अत्यन्त पवित्र इस कथा का श्रवण करता है, वह उसी क्षण अपने सात जन्मों के किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है ॥१५५॥ इस तरह ् रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के गो माहात्म्य वर्णन नामक अड़तालीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४८।। te ब्रह्मतेज को बढाने वाले नित्य कर्मो का वर्णन, तर्पण विधि का वर्णन, सदाचार वर्णन, धर्मबीज एवं पापबीज समुद्धुत मनुष्य का लक्षण नारदजी ने कहा-- किस प्रकार के आचरण से ब्राह्मण का ब्रह्मतेज बढता है और किस प्रकार के आचरण से ब्राह्मण का ब्रह्मतेज विनष्ट होता है ?॥१। ब्रह्माजी ने कहा-- ब्राह्मणश्रेष्ठ को चाहिए कि जब कुछ रात्रि शेष ही रहे तो जगकर देवताओं और पुण्य पुरुषों का स्मरण करे ॥२॥ गोविन्द, दामोदर, श्रीहरि, माधव, श्रीकृष्ण, नारायण, जगन्नाथ, अजन्मा तथा व्यापक भगवान् वासुदेव ॥३॥ सरस्वती, महालक्ष्मी, सावित्री, वेदमाता गायत्री, ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा, दिक्पाल, ग्रहों, शह्लरजी, शिव, शम्भु, ईश्वर, महेश्वर, गणेश, स्कन्द, गौरी, भागीरथी तथा शिवा इन देवताओं का स्मरण करे ॥४-५॥ राजा नल पुण्य श्लोक हैं, पुण्य श्लोक भगवान् जनार्दन है, वैदेही (सीताजी) पुण्यश्लोक हैं तथा राजा युधिष्ठिर पुण्य श्लोक हैं ॥६। अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य तथा परशुरामजी ये सातो चिरजीवी हैं ॥७॥ जो मनुष्य श्रातःकाल जगकर इन सबों का स्मरण

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