Srishti Khanda Extracted Page 691
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-691
Sanskrit Original
श्रीपदामहापुणण यथा गौश्च तथाविप्रो यथाविप्रस्तथा हरिः । हरिर्यथा तथा गंगा एतेनह्यावृषाः स्मृताः ॥१५५॥ गावो बंधुर्मनुष्याणां मनुष्या बांधवा गवाम् । गौश्च यस्मिन् गृहे नास्ति तद्व॑धुरहितं गृहम् ॥१५६॥ गोमुखे चाश्रिता वेदाः सषडंगपदक्रमाः । शृंगयोश्च स्थितौ नित्यं सहैव हरिकेशवौ॥९५७॥ उदरेवऽस्थितः स्कंदः शीर्षे ब्रह्मास्थितः सदा। वृषध्वजो ललाटे च श्रृंगाग्र इंद्र एव च ॥१५८॥ कर्णयोरश्चिनौ देवौ चक्षुषोश्शशिभास्करौ। दंतेषु गरुडो देवो जिह्वायां च सरस्वती ॥१५९॥ अपाने सर्वतीर्थानि प्रस्रावे चैव जाह्नवी । ऋषयो रोमकूपेषु मुखतः पृष्ठतो यमः ॥१६०॥ धनदो वरुणश्चैव दक्षिणं पार्श्वमाश्रितौ। वामपार्श्चे स्थिता यक्षास्तेजस्वंतो महाबलाः ॥१६९॥ मुखमध्ये च गंधर्वा नासाग्रे पन्नगास्तथा । खुराणां पश्चिमे पारश्चेऽप्सरसश्च समाश्रिताः ॥१६२॥ गोमये वसते लक्ष्मी गोमूत्रे सर्वमंगला । पादाग्रे खेचरा वेद्या हंभाशब्दे प्रजापतिः ॥१६३॥ चत्वारः सागराः पूर्णा धेनूनां च स्तनेषु वै । गां च स्पृशति यो नित्यं स्रातो भवति नित्यशः॥९६४॥ अतो मर्त्यः प्रपुष्टैस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते। गवां रजः खुरोद्धतं शिरसा यस्तु धारयेत्॥१६५॥ स च तीर्थजले स्त्रातः सर्वपापैः प्रमुच्यते। नारद उवाच गवां च दशवर्णानां कस्य दाने च किंफलम् ॥१६६॥ ब्रूहि तत्त्व गुरुश्रेष्ठ परमेष्ठिन्प्रियं यदि । श्रीहरि के समान गङ्गाजी हैं इनमें से एक भी अधार्मिक नहीं होते हैं ॥१५५॥ गायें मनुष्यों के बन्धु हैं और मनुष्य गायों के बन्धु हैं । जिस घर में गायें नहीं रहती हैं, वह घर बन्धु विहीन होता है ॥१५६॥ गायों के मुख में छहों अङ्गों तथा पदक्रम के साथ वेदों का निवास है । गौ के दोनों सीड़्ों में श्रीहरि और केशव दोनों का एक साथ निवास होता है ॥१५७॥। गौ के उदर में स्कन्द का निवास है शिर पर ब्रह्माजी का निवास है । ललाट में भगवान् शिव का निवास है, तथा गौ के सींग के अग्र भाग में इन्द्र का निवास है ॥१५८॥ गौ के दोनों कानों में अश्विरी कुमार नामक दो देवों का निवास हैं और नेत्रो में सूर्य और चन्द्रमा स्थित होते हैं ।दाँतों में गरुड देव का निवास है तथा जीभ में सरस्वती देवी का निवास है ॥१५९॥ गौ के अपान में सभी तीर्थो का निवास है तथा मूत्र स्थान में गङ्गा नदी का निवास है, गौ के रोमकूपों में ऋषियों का निवास है, मुख के पीछे यम का निवास है ॥१६०॥ गौ के दाहिने पार्श्व में कुबेर और वरुण का निवास है । गौ के वाम पार्श्व में महाबलवान् और तेजस्वी यक्षों का निवास होता है ॥१६१॥ गौ के मुख के भीतर गन्धर्वो का निवास है, नासिका के अग्रभाग में सर्पो का निवास है । गौ के खुरों के पश्चिम भाग में अप्सराओं का निवास है ॥१६२॥ गौ के गोबर में लक्ष्मी का निवास है, गोमूत्र में सर्वमङ्गला देवी का निवास है। गौ के पैरों के अग्रभाग में ग्रहों का निवास हैं तथा उसके खम्भा (खूंटा) में ब्रह्माजी का निवास है ॥१६३॥ गायों के चारो स्तनों में सभी सागरों का निवास है । जो व्यक्ति नित्य ही गौ का स्पर्श करता है, वह नित्य स्नान करने का फल प्राप्त करता है ॥१६४॥ ऐसा करने वाला मनुष्य बढे हुए अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है । जो व्यक्ति गाय के खुर से उड़ी हुयी धूल को अपने शिर पर चढाता है ॥१६५॥ वह मानो सभी तीर्थो के जल से स्नान कर लिया और उसके समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं । नारदजी ने कहा-- दश वर्णो की गायों में किसके दान करने से कौन सा फल होता है ॥१६६॥ हे परमेष्ठिन् गुरुश्रेष्ठ ! यदि मैं प्रिय हुँ तो आप इस बात को मुझे बतलायें ब्रह्माजी ने कहा-- श्वेतवर्ण की गौ का दान करके मनुष्य ईश्वर हो जाता है ॥१६७॥। वह मनुष्य सदा प्रासाद (महल) में
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