Srishti Khanda Extracted Page 690
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-690
Sanskrit Original
निरामिषं च यत्किचित् तस्माद्यद्यत्फलं लभेत्। तस्माद्नौः सर्वकार्येषु शस्त एको युगे युगे ॥१४३॥ सर्वदा सर्वकामेषु धर्मकामार्थमोक्षदः। नारद उवाच केषु कि वा प्रयोगेण परं पुण्यं प्रकीर्तितम् ॥१४४॥ वद तत्सर्वलोकेश यथा जानामि तत्वतः । ब्रह्मोवाच सकृत्प्रदक्षिणं कृत्वा गोधनं चाभिवंदयेत् ॥१४५॥ सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स्वर्ग चाक्षयमश्रुते। सुराचायों यथावंद्यः पूज्योऽसौ माधवो यथा ॥१४६॥ सप्तप्रदक्षिणं कृत्वा चैश्चर्यात्पाकशासनः । कल्य उत्थाय गोमध्ये पात्रं गृह्य सहोदकम् ॥१४७॥ निषिंचेद्यो गवां शृंगं मस्तकेनैव तज्जलम् । प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य पुण्यं निबोधत॥९४८॥ श्रूयंते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु नारद । सिद्धचारणयुक्तानि सेवितानि महर्षिभिः ॥१४९॥ अभिषेकस्समस्तेषां गवां श्रृंगोदकस्य च। प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद्नां च घृतं मधु ॥१५०॥ सर्षपांश्च प्रियंगुंश्च कल्मषात्प्रतिमुच्यते । घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः ॥१५१९॥ घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे संतु सदा गृहे। घृतं मे सर्वगात्रेषु धृतं मे मनसि स्थितम् ॥१५२॥ गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च। गावश्च सर्वगात्रेषु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥१५३॥ इत्याचम्य जपेञ्मंत्रं सायं प्रातरिदं शुचिः । सर्वपापक्षयस्तस्य स्वलोके पूजितो भवेत् ॥१५४॥ मांस रहित जो कुछ भी पदार्थ होता है, उसकी अपेक्षा यह लाख गुना और करोड़ों गुना की बात कही गयी इसीलिए सभी कार्यो में केवल गौ को ही सभी युगों में श्रेष्ठ कहा गया है ॥१४३॥ गौ सभी कामों में सदैव ही मोक्षप्रद है । नारदजी ने कहा-- किन कार्या में किस प्रयोग के द्वारा गौ पुण्यतमा होती हे ॥१४४॥ हे सभी लोकों के स्वामिन् इन सारी बातों को आप मुझे बतलाइये, जिससे कि मैं जान सकूँ । ब्रह्माजी ने कहा-- गोधन की एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करना चाहिए ॥१४५॥ ऐसा करने वाला सभी पापों से छूटकर अक्षय स्वर्ग प्राप्त कर लेता है । गौ की बृहस्पति के समान वन्दना करनी चाहिए, तथा भगवान् विष्णु के समान गौ पूज्य है ॥ १४६॥ उसकी सात बार प्रदक्षिण करने से इन्द्र के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । प्रात:काल उठकर जल भरे पात्र को लेकर गौ के बीच में जाकर उस जल से गौ के मस्तक एवं सींग को धोने का जो जल होता है, उसको निराहार रहकर जो अपने सिर पर धारण करता है उससे होने वाले पुण्य को मैं बतलाता हुँ ॥१४७-१४८॥ हे नारद ! सिद्धों और चारणों से युक्त तथा महर्षियों के द्वारा सेवित जितने भी तीर्थ त्रैलोक्य में सुने जाते हैं ॥१४९॥ उन सबों में स्नान करने का जो फल होता है, उसी के समान गौओं के श्रृङ्गोदक को समझना चाहिए । प्रातःकाल उठकर जो मनुष्य गौ, घी तथा मधु (शहद) का स्पर्श करता है ॥१५०॥ एवं सरसों, प्रियंगू का स्पर्श करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है । घी तथा दुग्ध देने वाली गायें घृतयोनि तथा घृतोद्धवा कही जाती हैं ॥१५१॥ गौ ही धृत की नदी, घृत के आवर्त वाली होती हैं । मेरे घर में सदा गौ निवास करे । मेरे सम्पूर्ण अङ्गों में घी होए, तथा घी मेरे मन में स्थित हैं ॥१५२॥ गायें मेरे आगे, पीछे तथा मेरे सभी अङ्गों में रहें में गायों के बीच में निवास करता हूँ॥ १५३॥ सायं तथा प्रातःकाल आचमन करके इस मन्त्र का जो उच्चारण करता है, उसके सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्ग लोक में पूजित होता हैं ॥१५४॥ गौ के ही समान विप्र होते हैं, विप्रों के समान श्रीहरि हैं ।
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