Srishti Khanda Extracted Page 689
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-689
Sanskrit Original
अग्निर्हव्यानि भुंजीत देवहेतोस्तथाद्विज:। आज्यं गोप्रभवं विद्धि तस्मादेते प्रसूतकाः ॥१२८॥ न संति यदि लोकेषु चत्वारोमी महत्तराः । तदाखिलं च भुवनं नष्टं स्थावरजंगमम् ॥१२९॥ एभिर्घृताः सदा लोकाः प्रतिष्ठति स्वभावतः | स्वभावो ब्रह्मरूपोऽसावेते ब्रह्ममयाः स्मृताः॥१३०॥ तस्माद्वौः पूजनीयोऽसौ विप्रदेवासुरैरपि। उदारः सर्वकार्येषु जातस्तथ्यो गुणाकरः ॥९३१॥ सर्वदेवमयः साक्षात्सर्वसत्वानुकंपकः । अस्य॒ कार्य मया सृष्टं पुरैव पोषणं प्रति ॥९३२॥ अतएव मयादत्तं वरं चातिसुशोभिनम्। एकजन्मनि ते मोक्षस्तवास्त्विति विनिश्चितम्॥१३३॥ अत्रैव ये मृता गावस्त्वागच्छति ममालयम् । पापस्य कणमात्रं तु तेषां देहे नतिष्ठति ॥१३४॥ देवी गौर्धेनुका देवाश्चदिदेवी त्रिशक्तिका। प्रसादाद्यस्य यज्ञानां प्रभवो हि विनिश्चितः ॥१३५॥ गवां सर्वपवित्राणि पुनंति सकलं जगत् मूत्रं गोर्गोमयं क्षीरं दधिसर्पिस्तथैव च ॥१३६॥ अमीषां भक्षणे पापं न तिष्ठति कलेवरे । तस्माद्घृतं दधिक्षीरं नित्यं खादंति धार्मिकाः ॥१३७॥ विशिष्टं सर्वद्रव्येषु गव्यमिष्टं परं शुभम्। यस्यास्ये भोजनं नास्ति तस्यमूर्तिस्तु पूतिका ॥१३८॥ अन्नाद्यं पञ्चरात्रेण सप्तरात्रेण वै पयः । दधिविंशतिरात्रेण घृतंस्यान्मासकैककम्॥१३९॥ अगव्यै र्यस्तु भुंक्ते वै मासमेकं निरंतरम्। भोजने तस्य मर्त्यस्य प्रेताः खादंति चैव हि॥१४०॥ परमान्नपरं शुद्धं स्विन्न॑ चातपतण्डुलैः । भुक्त्वा तु यत्कृतं पुण्यं कोटिकोटिगुणं भवेत्॥१४१॥ अन्यच्चापि च यदद्रव्यं हविष्यं शात्रनिर्मितम्। तद्धुक्त्वा यत्कृतं कर्म सर्वलक्षगुणं भवेत् ॥१४२॥ उत्पन्न हुए ॥१२६॥ उसमें भी मैंने एक-एक करके पहले वेदों को सभी लोकों तथा भुवनों की स्थिति (रक्षा) के लिए बनाया ॥१२७॥ देवताओं के लिए अग्नि तथा ब्राह्मण हव्य का उपभोग करते हैं । घी गौ से उत्पन्न होता है, अतएव गौ घृत उत्पन्न करने वाले हैं ॥१२८॥ यदि लोकों में ये चारो महान वस्तु न रहें तो फिर स्थावर जंगमात्मक का सम्पूर्ण संसार विनष्ट हो जाय ॥१२९॥ इन्हीं सबों के द्वारा धारण किये गये लोक स्वाभावतः प्रतिष्ठित रहते हैं । स्वभावतः ये ब्रह्मस्वरूप हैं अतएव ये चारो ब्रह्म स्वरूप कहे गये हैं ॥१३०॥ इसीलिए गौ, ब्राह्मण, देव तथा असुरों से भी पूज्य हैं । ये सभी कार्यो में उदार हैं यह तथ्य गुणाकर है ॥१३१॥ गौ साक्षात् सर्वदेवमय है तथा सभी जीवों पर कृपा करने वाले हैं । मैंने गौ का कार्य पोषण करना पहले ही बनाया है ॥१३२॥ इसीलिए मैंने गौओं को यह बहुत अच्छा वरदान दिया है कि तुमलोगों का एक ही जन्म में मोक्ष हो जायेगा, यह निश्चित है ॥१३३॥ इस संसार में जो गायें मर जाती हैं वे हमारे लोक में आती हैं । उन सबों के शरीर में पाप का कोई कण भी नहीं रहता है ॥१३४॥ गौ और देवी, धेनुक (बैल) देव हैं ।ये तीनों शक्ति स्वरूप आदि देवी है । उन्हीं की कृपा से यज्ञ की उत्पत्ति हुयी है ॥१३५॥ गौओं के मूत्र, गोबर, दुग्ध, दधि और घी ये सबके सब पवित्र हैं और संसार को पवित्र बनाती हैं ॥१३६॥ इन सबों को खाने से शरीर में कोई पाप नहीं रहता है, इसीलिए धार्मिक पुरुष घी, दही, दुग्ध, प्रतिदिन खाते हैं ॥१३७॥ सभी द्रव्यो में गव्य इष्ट और कल्याणकारी है । जिसके मुख में भोजन नहीं है उसकी मूर्ति पूतिका है ॥१३८॥ शरीर में खाया हुआ अन्न पाँच रात में पच जाता है, दूध सात रात तक शरीर में रहता है, दधि बीस रात्रि तक शरीर में टिकती है और घी एक मास तक रहता है ॥१३९। जो एक मास तक बिना गव्य पदार्थ के भोजन करता है उसके भोजन को प्रेत खाते हैं ॥१४०॥ जो अग्नि के संताप तथा चावल से पकाया जाता है व परमान्न (खीर) अत्यन्त शुद्ध होता है । उसके खाने से किया हुआ पुण्य करोड़ों गुना बढ़ता है ॥१४१॥ दूसरे भी द्रव्य जिसे शास्र हविष्य बतलाता है, उसको खाकर जो कर्म किया जाता है, उससे वह लाख गुणा बढता है॥१४२॥
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