Srishti Khanda Extracted Page 688
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-688
Sanskrit Original
प्राणस्य सदृशं पश्येद्वां च सामान्यविग्रहम् । अस्य देहे सुखं दुःखं तथा तस्यैव कल्पते ॥९९४॥ अनेन विधिना यस्तु कृषिकर्माणि कारयेत् । स च गोवाहनै दोषै र्न लिप्येत धनी भवेत्॥९१५॥ दुर्बलं पीडयेद्यास्तु तथैव गदसंयुतम् । अतिबालातिवृद्धं च स गोहत्यां समालभेत् ॥११६॥ विषमं वाहयेद्यस्तु दुर्बलं सबलं तथा। स गोहत्यासमं पापं प्राप्रोतीह न संशयः ॥९९७॥ योवाहयेद्विना सस्यं खादंतं गां निवारयेत् । मोहात्तणं जलं वापि स गोहत्या समं लभेत्॥९९८॥ संक्रांत्यां पौर्णमास्यां चामावास्यायां तथैव च। हलस्य वाहनात्पापं गवामयुतहत्यया ॥११९॥ अमूषुपूजयेद्यस्तु सितैश्चित्रादिभिर्नरः। कज्जलैः कुसुमैस्तैलैः सोऽक्षयं स्वर्गमश्नुते ॥९२०॥ घासमुष्टिं परगवे यो ददाति सदाह्विकम् । सर्वपापक्षयस्तस्य स्वर्गं चाक्षयमश्नुते॥१२९॥ यथाविप्रस्तथागौश्च द्योः पूजाफलं समम् । विचारे ब्राह्मणो मुख्यो नृणां गावः पशौ तथा॥१२२॥ नारद उवाच विप्रो ब्रह्ममुखे जातः कथितो मे त्वयानघ । कथं गोभिः समो नाथ विस्मयो मे विधे ध्रुवम्॥१२३॥ ब्रह्मोवाच शृणु चात्र यथा तथ्यं ब्राह्मणानां गवां यथा । एकपिंडक्रियैक्यं तु पुरुषैर्निर्मितं पुरा ॥१२४॥ पुरा ब्रह्ममुखोद्धूतं कूटं तेजोमयं महत् । चतुर्भागप्रजातं तद्देदोग्निगौर्जस्तथा ॥१२५॥ प्राकतेजः संभवो वेदो वह्निरेव तथैव च । परतो गौस्तथाविप्रो जातश्चैव पृथक् पृथक्॥१२६॥ तत्र सृष्टा मया चादौ वेदाश्चत्वार एकशः । स्थित्यर्थं सर्वलोकानां भुवनानां समंततः ॥९२७॥ के समान स्वच्छ रखे । उसमें प्रयत्न पूर्वक, शीत वायु तथा धूल डालते रहना चाहिए ॥११३॥ गौ के शरीर को . अपने प्राण के समान समझना चाहिए । बैलों के शरीर में अपने ही शरीर के समान सुख तथा दु:ख को समझना चाहिए ॥११४॥ इस विधि से जो कृषि कर्म करवाता है, वह गौ के जोतने के दोष से युक्त नहीं होता है तथा धनी हो जाता है ॥११५॥ जो दुर्बल तथा रोगी अत्यन्त छोटी अवस्था के अथवा अत्यन्त वृद्ध बैल को जोतता है, उसको गोहत्या का पाप लगता है ॥११६॥ जो दुर्बल अथवा सबल बैल को बहुत अधिक जोतता है, वह गोहत्या के समान पाप को प्राप्त करता है, इसमें कोई भी संशय नहीं है ॥११७॥ जो घास खिलाये बिना अथवा घास खाने से बैल को रोक देता है और उस बैल को जोतता है, अज्ञान वशात् उसे तृण और जल भी नहीं देता है, वह गोहत्या के पाप का भागी होता है ॥११८॥ संक्रान्ती, पूणिमा तथा अमावस्या तिथि को जो व्यक्ति हल में गौ को जोतता है उसको दश हजार गोहत्या का पाप लगता है ॥११९। इन तिथियों में जो गौ की पूजा धवल चित्रों, काजल, पुष्प एवं तेल से करता है वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥१२०॥ जो दूसरे के बैलों को प्रतिदिन एक मुट्ठी भी घास देता है उसके सारे पाप विनष्ट हो जाते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥१२१॥ गौ और ब्राह्मण दोनों की पूजा करने का एक समान फल होता है । विचार करने पर मनुष्यों में ब्राह्मण मुख्य है, और पशुओं में गौ प्रधान है॥१२२॥ नारदजी ने कहा-- हे अनघ ! आपने कहा है कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न है, वह गौ के समान कैसे हो सकता है, यही हमको आश्चर्य है ॥१२३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- इस समय तुम ब्राह्मणों और गौ के विषय में वास्तविक बात सुनो । प्राचीन काल में पुरुषों ने एक पिण्ड से एक क्रिया को बनाया ॥१२४॥ पहले ब्रह्म के मुख से महान् तेज समूह निकला उसके चतुर्थांश चतुर्थाश से क्रमशः वेद, अग्नि, गौ तथा द्विज उत्पन्न हुए ॥१२५॥ सर्वप्रथम तेज से वेद उत्पन्न हुए उसके बाद अग्नि उत्पन्न हुयी । फिर गौ और उसके बाद ब्राह्मण ये सब पृथक्-पुथक्
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