Srishti Khanda Extracted Page 687

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-687

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अश्वमेयसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते । यो वदेत्सर्वकार्येषु सत्यं मिथ्यां परित्यजेत् ॥९९॥ सनिस्तरति दुर्गाणि स्वर्गमक्षयमश्नुते। वाणिज्यं कारयेद्विप्रो मिथ्याऽ वश्यं परित्यजेत् ॥१० ०॥ वृद्धिं च निक्षिपत्तीर्थे स्वयं शेषं तु भोजयेत् । देहक्लेशात्तत्सहस्रगुणं भवति सर्वदा ॥१०९॥ अर्थार्जनविधौ मर्त्या विशंति विषमे जले । कांतारमटवीं चैव श्वापदैः सेवितां तथा ॥१०२॥ गिरिं गिरिगुहां दुर्गा म्लेच्छानां शस्त्रपातिनाम् । गृहं प्रति भयं स्थानं धनलोभात्समंततः ॥९०३॥ सुतदारान्परित्यज्य दूरं गच्छति लोभिनः। स्कंधे भारं वहंत्यन्ये तर्याचक्रे निपातनैः ॥९ ० ४॥ क्षेपणीभिर्महादुः खैस्सदा प्राणव्ययेन च। अर्थस्य संचय: पुत्र प्राणात्प्रयतरों महान् ॥१०५॥ एभिर्न्यायार्जितं वित्तं वणिग्भावेन यत्नतः । पितृदेवद्विजातिभ्यो दत्तं चाक्षयमश्नुते ॥१०६॥ एतौ दौषौ महांतौ च वाणिज्ये लाभकर्मणि । लोभानामपरित्यागो मृषाग्राह्यश्च विक्रय: ॥९०७॥ एतौ दोषौ परित्यज्य कुर्यादर्थार्जनं बुधः । अक्षयं लभते दानाद्वणिग्दोषैर्नलिप्यते ॥१०८॥ पुण्यकर्मरतो विप्रः कृषिं हि परिकारयेत्। वाहयेद्दिवसस्यार्थ बलीवर्दचतुष्टयम् ॥९०९॥ अभावात्त्रितयं चैव अविश्रामं न कारयेत्। चारयेच्च तृणेऽच्छिन्ने चोरव्याघ्रविवर्जिते॥११०॥ दद्याद्घासं यथेष्टं च नित्यमातर्पयेत्स्वयम् । गोष्ठं च कारयेत्तस्य किंचिद्विध्नविवर्जितम् ॥१११॥ सदागोमयमूत्राभ्यां विघसैश्च विवर्जितम् । न मलं निक्षिपेद्रोष्ठे सर्वदेवनिकेतने ॥११२॥ आत्मनः शयनीयस्य सदृशं कारयेटूधः । समं निर्वापयेद्यत्माच्छीतवातरजस्तथा ॥१ १ ३॥ तुला पर सत्य को रखो ॥९८॥ हजार अश्वमेघ से सत्य ही भारी होता है । जो सभी कार्यो में सत्य ही बोलता हे और मिथ्या का परित्याग कर देता है ॥९९॥ वह सभी संकटों को पार करके अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है । ब्राह्मण वाणिज्य को करे किन्तु मिथ्या का परित्याग कर दे ॥१००। जो वृद्धि हो उसको तीर्थ में लगा देऔर अवशिष्ट वस्तु का भोग करे । ऐसा करना देह को क्लेश देकर तपस्या करने की अपेक्षा सौ गुना अधिक फलप्रद होता है ॥१०१॥ धनार्जन करने के लिए लोग विषम जल में प्रवेश कर जाते हैं । वे कान्तार (वन) तथा हिंसक जन्तु युक्त अरण्यानी में भी चले जाते हैं ॥१०२॥ धन के लोभ से लोग पर्वतो में, पर्वतों की कन्दराओं में, शस्त्रपात करने वाले म्लेच्छों के घर तथा अत्यन्त भयङ्कर स्थान में जाते हैं ॥१०३॥ लोभी पुरुष पुत्र तथा पत्नी का परित्याग करके दूर चले जाते हैं । वे अपने कन्धे पर भार ढोते हैं तथा क्षेपणी के द्वारा वे नावों में रहकर अत्यन्त कष्ट पूर्वक नाव खेने का काम करते हैं । हे पुत्र ! अर्थ का संचयन प्राणों से भी प्रिय होता है ॥१०४-१०५॥ इन सभी साधनों से तथा व्यापार के द्वारा प्रयत्न पूर्वक अर्जित धन यदि पितरों, देवों तथा ब्राह्मणों को दान दिया जाता है तो उससे अक्षय फल की प्राप्ति होती है ॥१०६॥ लाभ के कर्म वाणिज्य के दो दोष महान हैं लोभ का परित्याग न करना तथा झूठ बोलना॥१०७॥ विद्वान् को चाहिए कि वह इन दोनों दोषों का परित्याग करके वाणिज्य द्वारा अर्थार्जन करे । उसका दान करके उसे अक्षय फल की प्राप्ति होती हैऔर उसको व्यापार का दोष नहीं लगता है ॥१०८॥ पुण्य कर्म करने वाले विप्र को कृषि ही करवाना चाहिए । वह आधे दिन तक चार बैलों को जोते ॥१०९॥ चार बैलों के अभाव मे तीन से ही का चलाये, किन्तु उन सबों को निरन्तर नहीं जोते । बैलों को बिना कटी हुयी घास को चोर तथा व्याघ्र आदि से रहितस्थान में चराये ॥११०॥ उन सबों को यथेष्ट निवास स्थान प्रदान कराये अथवा स्वयं करे और उन सबों को भर पेट खिलाये । बैलों की गोशाला को बिल्कुल साफ रखे ॥१११॥ उसमें कभी गोबर और मूत्र नहीं रहना चाहिए । गोशाला में सभी देवताओं का निवास होता है, अतएव उससें कभी मल न फेंके ॥११२॥ उसे अपने सोने के स्थान

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know