Srishti Khanda Extracted Page 686

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-686

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Sanskrit Original

पुरतः कल्पवृक्षाश्च तिष्ठंति सर्वदायिनः । वापीकूपतटाकाद्यै रुद्यानैरुपशोभिते ॥८ ४॥ यौवनाढ्याश्च सेवंते तं देवपुरकन्यकाः । तस्याग्रतो मुदा नित्यं नृत्यंत्यप्सरसांगणाः ॥८५॥ गीतं गायंति गंधर्वा देवाश्च स्तुतिपाठकाः । एवं क्रमेण कल्पांते सार्वभौमो भवेन्नपः ॥८६॥ सर्वभोगैककर्ता च नीरुङ्मन्मथविग्रहः । तस्यपत्न्यः प्ररूपाढ्याः सदैव यौवनान्विताः ॥८७॥ धर्मशीलाः सुताः शुभ्राः समृद्धाः पितृसंमताः । एवं क्रमेण भुंजति सप्तजन्मसु क्षत्रियाः ॥८८॥ अन्यायेन तुयोद्धारस्तिष्ठंति नरके चिरम् । एवं च _क्षत्रियावृत्तिर्ब्राह्मणैरुपजीव्यते ॥८ ९॥ वैश्यैः शूद्रैस्तथान्यैश्च अंत्यजैर्म्लेच्छजातिभिः । ये च योधाः प्रयुध्यंते न्याययुद्धेन सर्वदा॥९०॥ तेऽपि यांति परं स्थानं सर्वे वर्णा द्विजातयः। न शूरो योद्विजोभीरुरस्त्रशस्त्रविवर्जितः ॥९ १॥ विपत्तौ वैश्यवृतिं च कारयेदि्द्वजसत्तम: । वैश्यवृत्ति वणिग्भावं कृषि चैव तथापरैः ॥९२॥ कारयेत्कृषिवाणिज्यं विप्रकर्म न च त्यजेत्। वणिग्भावान्मृषात्युक्तौ दुर्गतिं प्राप्रुयादिहजः ॥९३॥ आर्द्रद्र॒व्यं परित्यज्य ब्राह्मणो लभते शिवम्। समुत्पाद्य ततो वृत्ति दद्याद्विप्राय सर्वशः॥९४॥ पितृयज्ञे तथाचाग्नौ जुहुयाद्विधिवादिद्वज: । तुलेऽसत्यं न कर्त्तव्यं तुलाधर्म प्रतिष्ठिता ॥९५॥ छलभावं तुले कृत्वा नरकं प्रतिपद्यते । अतुलं चापि यद्द्रव्यं तत्रमिथ्यापरित्यजेत् ॥९६॥ एवं मिथ्या न कर्त्तव्या मृषा पापप्रसूतिका। नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम् ॥९७॥ अतः सर्वेषु कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते । अश्वमेधसहृसं तु सत्यं च तुलया धृतम् ॥९८॥ देने वाले कल्प वृक्ष रहते हैं । वह प्रासाद, वापी, कूप, तडाग तथा उद्चानों से सुशोभित होता है ॥८४॥ देवगनरी की युवती कन्यायें उसकी सेवा करती हें । उसके सामने प्रसन्नता पूर्वक अप्सराओं का समूह सदा नृत्य करता रहता है ॥८५॥ गन्धर्वो का समूह गीत गाता है और देवता उसकी स्तुति करते हैं । इसतरह से एक कल्प तक रहने के पश्चात् वह पृथिवी का सार्वभौम राजा होता है ॥८६॥ सभी भोगों को करने वाला रोगरहित, तथा कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाला होता है । उसकी पत्नियाँ रूप सम्पन्न तथा सदैव युवती रहती हैं ॥८७॥ उसके पुत्र धार्मिक, स्वच्छ, समृद्ध तथा पिता के अनुकूल रहने वाले होते हैं । इसतरह सत् क्षत्रिय सात जन्मों के भोगों को भोगते हैं॥८८॥ जो क्षत्रिय अन्याय पूर्वक युद्ध करते हैं वे नरको में चिरकाल पर्यन्त रहते हैं । इसी तरह की क्षत्रिया वृत्ति को ब्राह्मण अपना उपजीव्य बनाते हैं ॥८९॥ वैश्य, शूद्र तथा दूसरे अन्त्यज तथा म्लेच्छ जाति के भी जो योद्धा सदा न्याय पूर्वक युद्ध करते हैं, वे भी सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करते हैं । सभी वर्ण द्विजाति के ही होते हैं । जो द्विज भयभीत रहने वाला अस्र-शस्र के ज्ञान से रहित होता है, वह वीर नहीं होता है ॥९०-९१॥ विपत्ति आने पर ब्राह्मण श्रेष्ठ को वैश्य वृत्ति भी करना चाहिए । बनियापन को ही वैश्य वृत्ति कहते हैं, तथा कृषि को भी वैश्य वृत्ति कहते हैं।।९ २॥ वह वणिग्वृत्ति कृषि को भी कराये; किन्तु विप्रकर्म का परित्याग न करे । वणिग्भाव को अपनाने वाला ब्राह्मण यदि झूठ बोलता है तो वह दुर्गति को प्राप्त करता है ॥९३॥ हजार अश्वमेध यज्ञ करने की अपेक्षा सत्य की महिमा अधिक होती ह । आर्द्रद्र॒व्य का परित्याग करके ब्राह्मण कल्याण को प्राप्त करता है । उससे वृत्ति को उत्पन्न करके पूरा-का-पूरा ब्राह्मण को दान कर दे ॥९४॥ श्राद्ध तथा होम ब्राह्मण को विधिपूर्वक करना चाहिए । तौलने में असत्य भाषण नहीं करना चाहिए तुला धर्म प्रतिष्ठित होते हे ॥९५॥ अतएव मिथ्या भाषण नहीं करना चाहिए मिथ्या भाषण पाप को उत्पन्न करने वाला है । सत्य से बढकर कोई दूसरा धर्म नहीं है और मिथ्या से बढकर कोई दूसरा पाप भी नहीं है ॥९६-९७॥ अतएव सभी कार्यो में सत्य ही महान् है । हजार अश्वमेध को एक तुला पर और दूसरी

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