Srishti Khanda Extracted Page 685

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-685

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Sanskrit Original

तस्माहद्यात्सुबहूनि पितृदेवद्विजातिषु । अभावाव्क्षत्रिया वृत्तिर्ब्राह्मणैरुपजीव्यते ॥७०॥ न्याययुद्धेष योद्धव्यं चरेद्वीरव्रतं शुभम् । स तया च द्विजो वृत्या यद्धनंलभते नृपात् ॥७१॥ पितृयज्ञादिदानेषु मेध्यं तद्धनमुच्यते । समभ्यसेद्धनुर्विद्यां वेदयुक्तां सदानघः ॥७२॥ शक्तिकुंतगदाखड्गपरिघाणां समंततः । अश्वारोहं गजारोहमैद्रजालममानकम् ॥७३॥ रथभूमिगतं युद्धं युक्तं सर्वत्र कारयेत् । द्विजदेवश्नुवाणां च स्त्रीणां वृत्तं तपस्विनाम् ॥७४॥ साधुसाध्वीगुरूणां च नृपाणां रक्षणाद् ध्रुवम्। यत्पुण्यं लभ्यते शूरैः कथं तद्ृह्मवादिभिः ॥७५॥ सर्वपापक्षयं कृत्वा सोऽक्षयं स्वर्गमश्नुते। सम्मुखे न्याययुद्धे च पतंति ब्राह्मणा रणे ॥७६॥ ते व्रजंति परं स्थानं नगम्यं ब्रह्मवादिनाम् । धर्मयुद्धस्य यद्वृत्तं शृणु पुण्यं यथार्थतः ॥७७॥ संमुखेन प्रयुध्यंते न च गच्छंति कातरम् । न भग्नं पृष्ठतो घ्नंति निःशस्त्रं प्रपलायितम् ॥७८॥ अयुध्यमानं भीरुं च पतितं गतकल्मषम् । असच्छूद्रं स्तुतिप्रीतमाहवे शरणागतम् ॥७९॥ हत्वा च नरकं यांति दुर्वृत्ता जयकांक्षिणः। एषा च क्षत्रिया वृत्तिः सदाचारैस्तु गीयते ॥८०॥ यामाश्रित्य दिवं यान्ति सर्वक्षत्रियकुंजराः । धर्मयुद्धे शुभो मृत्युः संमुखेक्षत्रियस्य च ॥८९॥ अत्र पूतो भवेत्सोपि सर्वपापैः प्रमुच्यते । स॒ तिष्ठेत्स्वर्गलोके च प्रासादेरत्नभूषिते ॥८ २॥ जांबूनदमयस्तंभे रत्नभूषितभूतले । इष्टद्रव्यैः सुसंपूर्णे दिव्यवस्त्रोपशोभिते ॥८३॥ धन्य हैं । अन्न के कारण होने वाली हिंसा के पाप की शान्ति के लिए ॥६८॥ नवीन उत्पन्न प्रशस्त अन्न ब्राह्मणों को देना चाहिए । ऐसा नहीं करने पर प्राणियों का वध हो जाने से आयु क्षीण होती है ॥६९॥ अतएव पितरों को, देवताओं को तथा ब्राह्मणों को बहुत अन्न प्रदान करना चाहिए । इन वृत्तियों के अभाव में ब्राह्मणों को क्षत्रियों की वृत्ति अपनानी चाहिए ॥७०॥ उसे न्यायानुकूल युद्ध करना चाहिए तथा वीखत का अचारण करना चाहिए । उस वृत्ति के द्वारा उसे जो राजा से धन मिले ॥७१॥ उससे श्राद्ध आदि तथा दान करे ऐसा करने से वह धन पवित्र कहा गया है । वह वेद से युक्त धनुर्विद्या का अभ्यास करके ॥७२॥ शक्ति, कुन्त (भाला), गदा, खड्ग तथा परिघ के साथ अश्वारोहरण, गजारोहरण, इन्द्रजाल, अमानक, आदि का ॥७३॥ एवं रथ युद्ध, भूमि पर रहकर युद्ध को सर्वत्र करवाये । ब्राह्मण, देवता, स्त्रियों तथा तपस्वियों के वृत्तान्त सज्जनों, साध्वियों, गुरुजनों तथा राजाओं की रक्षा करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, उसकी प्राप्ति ब्रह्मवादियों को भी नहीं होती है ॥७४-७५॥ सभी पापों को विनष्ट करके वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है । न्याय युद्ध में जो ब्राह्मण सामने गिरते हैं ॥७६॥ वे उस श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करते हैं, जिस स्थान को ब्रह्मज्ञानी पुरुष भी नहीं प्राप्त कर पाते हैं । धर्मयुद्ध का जो वास्तविक स्वरूप है उसे सुनो ॥७७॥ जिस युद्ध में योद्धा सामने युद्ध करते हैं, वे कभी कातर नहीं होते हैं । वे गिरे हुए को पीछे से नहीं मारते हें और न तो शखहीन तथा पलायन किए हुए को मारते हैं ॥७८॥ युद्ध नहीं करने वाले, डरपोक, गिरे हुए, निष्पाप, असच्छूद्र और स्तुति करके प्रसन्न हुए तथा शरणागत को युद्ध में मारने वाला नरकगामी होता है, क्योंकि ऐसे लोग गलत ढंग से विजय प्राप्त करना चाहने वाले होते हैं । सदाचारियों ने इसी को क्षत्रियों की वृत्ति बतलाया है ॥७९-८०॥ इस क्षत्रिया वृत्ति को अपनाकर सभी क्षत्रिय वीर स्वर्गलोक में जाते हैं । क्षत्रिय की धर्मयुद्ध में सामने मृत्यु शुभ होती है ॥८१॥ इस युद्ध में वह पवित्र हो जाता है और सभी पापों से मुक्त हो जाता है । वह स्वर्गलोक में रत्न जटित महल में निवास करता है ॥८ २॥ उस प्रासाद के स्तम्भ रत्ममय तथा फर्श रत्न भूषित होते है । वह प्रासाद सभी अभिप्रेत वस्तुओं से भरा रहता है तथा दिव्य वस्रं से सुशोभित होता है ॥८३॥ उसके सामने सब कुछ

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