Srishti Khanda Extracted Page 684
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-684
Sanskrit Original
तात्कालिकवधं हत्वा हंतारमाततायिनम् ।न च हंता च तत्पापैर्लिप्यते द्विज सत्तम ॥५६॥ आततायिनमायांतमपि वेदांतगं रणे । जिघांसंतं जिघांसेच्च न तेन ब्रह्महा भवेत् ॥५७॥ अभ्रिदो गरदश्चैव धनहारी च सुप्तघः । क्षेत्रदारापहारी च षडेते ह्याततायिनः ॥५८॥ खलो राजवधोद्योगी पितृणां च वधे रतः। अनुयायी नृपो राज्ञश्चत्वारश्चाततायिनः ॥५९॥ ततक्षणान्न मृतं विप्रं पुनर्हतुं न युज्यते। पुर्नहत्वा वधं घोर ज्ञानात्प्राप्रोति निश्चितम्॥६०॥ लोके विप्रसमो नास्ति पूजनीयो जगदुरुः । हत्वा तं यद्धवेत्पापं तत्परं च न विद्यते ॥६९॥ देववत्पूजनीयऽ सौ देवासुरगणैर्नरैः। ब्राह्मणस्य समो नास्ति त्रिषु लोकेषु निश्चितम्॥६ २॥ नारद उवाच कां वृत्तिं समुपाश्रित्यजीवितव्यं द्विजेन हि । अपानेन सुरश्रेष्ठ तत्वतो वक्तुमर्हसि ॥६३॥ ब्रह्मोवाच अयाचिता च या भिक्षा प्रशस्ता सा प्रकीर्तिता। उज्छवृत्तिस्ततो भद्रा सुभद्रा सर्ववृत्तिषु॥६४॥ यामाश्रित्य मुनिश्रेष्ठा गच्छन्ति ब्रह्मणः पदम् । दक्षिणा यज्ञशेषाणां ग्राह्या यज्ञगतेन हि॥६५॥ पाठनं याजनं कृत्वा ग्रहीतव्यं धनं द्विजैः । पाठयित्वा पठित्वा च कृत्वा स्वत्ययनं शुभम्॥६६॥ ब्राह्मणानामिदं जीव्यं शिष्टा वृत्तिः प्रतिग्रहः। शास्त्रोपजीविनो धन्या धन्या वृक्षोपजीविनः॥६७॥ धन्या वृक्षलता जीव्या वाटीसस्योपजीविनः । अन्नजं तु बधे पापं तस्य दोषोपशांतये ॥६८॥ नव धान्यानि शस्तानि विप्रेभ्यः संप्रदापयेत्। न चेत्ाणिधे ह्यात्र क्षीयंते चायुषो ध्रुवम् ॥६९॥ श्रेष्ठ किसी आतातायी को मारता है, वह न तो मारने वाला होता है और न तो अततायी के मारने का पाप ही लगताहे ॥५६॥ युद्ध में आते हुए वेदान्तज्ञ भी आतातायी को जो मारना चाहता है उसको मार देना चाहिए । उससे मारने वाले को ब्रह्महत्या का दोष नहीं लगता है ॥५७॥ किसी के घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला, किसी का धन चुराने वाला तथा सोये हुए को मारने वाला, दूसरे का खेत हड़पने वाला और दूसरे की पत्नी का अपहरण करने वाला ये छहो आतातायी हैं ॥५८॥ दुष्ट, राजा को मारने का प्रयास करने वाला, माता-पिता का वध करने वाला तथा राजा का अनुयायी नृप ये चारो आतातायी हैं ॥५९।। जो ब्राह्मण मारने के तत्क्षण नहीं मरता है, उसको फिर मारना उचित नहीं है, क्योंकि फिर मारने से उसको घोर पाप लगता है ॥६०॥ संसार में ब्राह्मण के समान पूजनीय कोई जगदगुरु नहीं है । उसको मारने से जो पाप होता है उससे बढकर कोई भी दूसरा पाप नहीं होता है॥६ १॥ देवता, असुर तथा मनुष्यों के द्वारा वह देवता के समान पूजनीय होता है । यह निश्चित है कि ब्राह्मण के समान दूसरा कोई भी पूजनीय नहीं है ॥६२॥ नारदजी ने कहा-- हे सुरश्रेष्ठ ! किस प्रकार की वृत्ति को अपनाकर ब्राह्मण को अपने जीवन का निर्वाह करना चाहिए इसे आप बतलायें ॥६३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- जो भिक्षा बिना माँगे ही मिल जाय वह श्रेष्ठ है । उससे भी श्रेष्ठ है उञ्छ वृत्ति । वह ब्राह्मणों की सभी वृत्तियों में सर्वाधिक कल्याणकारिणी है ॥६४॥ उस वृत्ति को अपनाने वाले ब्राह्मण ब्रह्मलोक में जाते हैं । अथवा ब्राह्मणों को यज्ञ में जाकर यज्ञ के अन्त में दक्षिणा प्राप्त करना चाहिए ॥६५॥ ब्राह्मणों को पढाकर, यज्ञ कराकर भी धन प्राप्त कर लेना चाहिए । पढाकर अथवा पढकर तथा दूसरे का कल्याण करके ॥६६॥ जीविका प्राप्त करना तथा दान से धन प्राप्त करना शिष्ट वृत्ति हे । शास्त्र से अपनी जीविका को चलाने वाले तथा वृक्षों के द्वारा अपनी जीविका चलाने वालेब्राह्मण धन्य हैं ॥६७॥ वृक्षों तथा लताओं से जीविका चलाने वाले, वाटी तथा खेती से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण
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