Srishti Khanda Extracted Page 683
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-683
Sanskrit Original
विषमां वा कुतस्तिष्ठेत्तत््वतो वक्तुमर्हसि। ब्रह्मोवाच हत्वा विप्रं ध्रुवं पुत्र पातकं यदुदाहृतम् ॥४२॥ लभते ब्रह्महा घोरं वक्तव्यं चापरं शृणु। लक्षकोटिसहस्राणां ब्राह्मणानां वधं भजेत् ॥४३॥ वेदशास्त्रयुतं हत्वा श्रोत्रियं विजितेंद्रियम् । विप्रं च वैष्णवं हत्वा तस्माद्दशगुणोत्तरम् ॥४४॥ स्ववंशान् पातयित्वा तु पुनर्जन्म न विंदते। त्रिवेदं स्नातकं हत्वा वधस्यांतं न विन्दते ॥४५॥ श्रोत्रियं च सदाचारं तीर्थमत्रप्रपूतकम्। ईदृशं ब्राह्मणं हन्तुः पापस्यांतो न विद्यते ॥४६॥ अपकारं समुदिश्य द्विजः प्राणान्परित्यजेत् । दृश्यते येन चान्येन ब्रह्महा स भवेन्नरः ॥४७॥ वचोभि परुषैर्वृत्तैः पीडिस्ताडितो द्विजः। यमुद्दिश्य त्यजेत्प्राणांस्तमा हुर्ब्रह्मघातिनम् ॥४८॥ ऋषयो मुनयो देवाः सर्वे ब्रह्मविदस्तथा । देशानां पार्थिवानां च सा च वध्या भवेदिह ॥४९॥ अतो ब्रह्मवधं प्राप्य पितृभिः सह पच्यते । प्रायोपवेशकं विप्रं बुधः संमानयेद् ध्रुवम् ॥५०॥ दोषैश्चापि विनिर्मुक्तमुहिश्य प्राणमुत्सृजेत्। स प्रलिप्तो वधैघोरैर्न तु यं परिकीर्तयेत् ॥५१॥ आत्मघातं द्रुमारोहं कोटरै रुपजीवनम् । यः कुयदत्मनोघातं स्ववंशे ब्रह्महा भवेत्॥५२॥ भ्रूणं च घातयेद्यस्तु शिशुं वा आतुरं गुरुम् । ब्रह्महा स्वयमेवस्यात्रतु यं परिकीर्तयेत् ॥५३॥ मारयेच्च सगोत्रं वा ब्राह्मणं ब्राह्मणाधमः । तस्यैव तद्धवेत्पापं न तु यं परिकीर्तयेत् ॥५४॥ पीडयित्वा द्विजं शूद्र; स्वकार्यं चापि साथयेत्। तत्रापापे च शूद्रस्य पातकं नान्यथा भवेत्॥५५॥ बतलाने की कृपा करें ब्रह्माजी ने कहा-- हे पुत्र ! ब्राह्मण का वध करने वाले को वह पाप अवश्य लगता है जिसे मैंने बतलाया है ॥४२॥ हे पुत्र ! उसके विषय में जो कहना है, वह सुनो । लाख करोड़ हजार ब्राह्मणों के वध का पाप उसको लगता है जो जितेन्द्रिय तथा वेदज्ञ श्रोत्रिय का वध करता है । वैष्णव ब्राह्मण को मारने वाले को उसके दश गुना पाप लगता है ॥४३-४४॥ जो अपने वंश वालों को मारता है उसको पुन: जन्म नहीं मिलता है । जो तीन वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण को मारता है, उसके पापों का कोई अन्त नहीं है ॥४५॥ जो श्रोत्रिय, सदाचारी तथा तीर्थ एवं मन्त्र से पवित्र ब्राह्मण है, इस प्रकार के ब्राह्मण को मारने वाले के पाप का कभी अन्त नहीं होता है ॥४६॥ अपकारों को बतलाकर अपने प्राणों का परित्याग करते हुए ब्राह्मण को जो देखता रहता हे, उसको ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥४७॥ कठोर वाणी द्वारा पीडित तथा प्रताडित ब्राह्मण जिसके कारण अपने प्राणों का परित्याग करता है, उसको ब्रह्मघाती कहा गया है ॥४८॥ ऋषियों मुनियों, देवों, सभी ब्रह्मज्ञानी देश और राजा के घातक सभी ब्रह्म हत्यारे हें॥४९॥ अतएव ब्रह्महत्या करने वाला अपने पितृगणों के साथ नरकगामी होता है । जो ब्राह्मण सभी बातों में बुलाये जाते है, उनका सम्मान करना चाहिए ॥५०॥ दोषों से रहित व्यक्ति को भी दोषी बतलाकर जो अपने प्राणों का परित्याग कर देता है वह मरने वाला ही वधजन्य पाप का भागी होता है, जिसको पापी बतलाया गया है वह नहीं।।५ १। आत्मघात, पेड़ों पर चढना तथा वृक्षों के कोटरों से जो अपना जीवन चलाता है ऐसा व्यक्ति यदि आत्मघात करता है तो वह अपने वंश में ब्रह्मघाती होता है ॥५२॥ जो व्यक्ति गर्भ या बालक, या आतुर, या गुरुजन का वध करता है वह स्वयं ब्रह्मघाती है, जिसको बतलाये वह नहीं ॥५३॥ जो अधम ब्राह्मण अपने गोत्र के ब्राह्मण को मारता है, तो उसका पाप उसी को लगता है, कहने वालों को नहीं ॥५४॥ यदि कोई पापी शूद्र ब्राह्मण को दुःख देकर अपना कार्य सिद्ध करता है वह निष्पाप शूद्र को ही पाप लगता है, अन्यथा नहीं ॥५५॥ यदि कोई ब्राह्मण
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