Srishti Khanda Extracted Page 682
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-682
Sanskrit Original
एषां मध्ये महाकुष्ठास्त्रय एव प्रकीर्तिताः । कालकुष्ठस्तथाशुक्लस्तरुणश्चातिदारुणः ॥२९॥ महापातकभावानां ज्ञानात्संसर्गतोपि वा । अतिपातकिनामेव त्रयो देहे भवंति वै ॥३०॥ संसर्गात्सहसंबंधाद्रोगः संचरते नृणाम्। दूरात्परित्यजेद्धीरः स्पृष्ट्वा स्नानं समाचरेत्॥३९॥ पतितं कुष्ठसंयुक्तं चांडालं च गवाशिनम् । श्वानं रजस्वलां भिल्लं स्पृष्ट्वा स्नानं समाचरेत् ॥३२॥ दुरितस्यानुरूपेण देहे कुष्ठा व्यवस्स्थिताः। इह लोके परत्रैवाप्यत्र नास्ति तु संशयः ॥३३॥ न्यायेनोपार्जितां वृत्ति ब्रह्मस्वं हरते तु यः । अक्षयं नरकं प्राप्य पुनर्जन्म न विद्यते॥३४॥ पिशुनो यस्तु विप्राणां रंध्रान्वेषणतत्परः। तं दृष्ट्वाप्यथवास्पृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत् ॥३५॥ ब्रह्मस्वं प्रणयाद्भुक्तं दहत्यासप्तमं कुलम् । विक्रमेण तु भुंजानो दशपूर्वान्दशापरान् ॥३६॥ नविषं विषमित्याहु ब्रह्मस्वं विषमुच्यते । विषमेकाकिनं हंति ब्रह्मस्वं पुत्रपौत्रकम् ॥३७॥ मोहाच्च मातरं गत्वा ब्राह्मणीं च गुरोस्त्रियम्। पतित्वा रौरवे घोरे पुनरुत्पत्तिदुर्लभः ॥३८॥ पतंति पितरस्तस्य कुंभीपाकेऽ थतापने । अवीचिकालसूत्रे च महारौरवरौरवे ॥३९॥ कदाचिदपि वा तेषां निष्कृतिं नानुमेनिरे । प्राणं हत्वाद्विजातीनां स्वयं यात्यपुनर्भवम् ॥४०॥ पतंति पुरुषास्तस्य रौरवे च सहस्रशः। नारद उवाच सर्वेषामेव विप्राणां वधे च पातकं समम् ॥४१॥ उसी से वह मर जाता है ॥२८॥ इन आठ प्रकार के कोढों में तीन ही प्रकार के कोढ महाकोढ हैं । कालकुष्ठ, श्वेतकुष्ठ तथा भयङ्कर तरुणकुष्ठ ॥२९॥ महापातकों के करने अथवा उनके संसर्ग के कारण महापापियों को ही ये तीनों प्रकार के कोढ होते हैं ।।३०॥ संसर्ग के कारण तथा साथ-साथ संबन्ध के कारण रोग का संचरण होता है । अतएव इन सबों को ज्ञानियों को दूर से ही त्याग देना चाहिए अथवा उनका स्पर्श हो जाने पर स्नान करे ॥३१॥ पतित, कोढी, चाण्डाल, गोमांसभक्षी, कुत्ता, रजस्वला और भिल्ल इन सबों का यदि स्पर्श हो जाय तो स्नान करना चाहिए ॥३२॥ जिसका जैसा पाप होता है उसके देह में उसके अनुसार ही इस लोक में अथवा परलोक में कोढ होता है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है ॥३३॥ जो मनुष्य ब्राह्मण की न्यायोपार्जित सम्पत्ति का अपहरण करता है, वह अक्षय नरक में चला जाता है, वह कभी जन्म नहीं लेता है ॥३४॥ जो चुगुलखोर व्यक्ति ब्राह्मणों के दोषों को ही खोजता रहता है उसको देखकर उसका यदि स्पर्श भी हो जाय तो वस्र को पहने हुए ही स्नान कर लेना चाहिए॥३५॥ प्रेम पूर्वक भी यदि कोई ब्राह्मण की सम्पत्ति को खाता है तो वह उसकी सात पीढी का विनाश कर देता है । यदि कोई बल का प्रयोग करके ब्रह्मस्व को खा लेता है तो वह उसके दश पीढी पहले के तथा दश पीढी बाद का भी विनाश कर देता है ॥३६॥ विष को विष नहीं कहा गया है । ब्रह्मस्व ही विष है, विष तो केवल विष खाने वाले को मारता है और ब्रह्मस्व तो खाने वाले के पुत्रों तथा पौत्रों को भी विनष्ट कर देता है ॥३७॥। अज्ञानवशात् माता, ब्राह्मणी या गुरुपत्नी के साथ सहगमन करने वाला घोर रौरव नरक में गिर जाता है, और उसका पुन: जन्म नहीं होता है ॥३८॥ उसके पितृगण कुंभीपाक तथा तापन नरक में गिर पड़ते हैं । वे अवीचि, कालसूत्र महारौरव तथा रौरव नरक में भी चले जाते हैं ॥३९॥ ऋषियों ने उनका कभी भी उद्धार नहीं बतलाया है । द्विजातियों का वध करने वाला स्वयं फिर कभी जन्म नहीं लेता है ॥४०। उसके हजारो पूर्वज रौरव नरक में गिर जाते हैं नारदजी ने कहा किसी मी ब्राह्मण का वध करने पर एक समान फल होता है क्या ?॥४१॥ अथवा उनमें कोई विषमता होती है उसे आप
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