Srishti Khanda Extracted Page 681
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-681
Sanskrit Original
परुषेण क्रोशयित्वा क्रोधाद्यस्तु विसर्जयेत् ।स याति नरकं घोरं महारौवकृष्छूकम् ॥१५॥ सन्निवृत्तस्ततः कौटाद्यन्त्यजातिषु जायते । ततो रोगी दरिद्रस्तु क्षुधया परिपीडितः॥१६॥ नावमन्येत्ततोविप्रं क्षुधया गृहमागतम् । न ददामीति यो ब्रूयाद्देवाग्निब्राह्मणेषु सः ॥१७॥ तिर्यग्योनिशतं गत्वा चाडाल्यमुपगच्छति । पादमुद्यम्य यो विप्रं हंति गां पितरौ गुरुम्॥१८॥ रौरवे नियतोवासस्तस्य नास्तीह निष्कृतिः । यदिपुण्याद्भवेज्जन्म स एवं पंगुतां ब्रजेत् ॥१९॥ अतिदीनो विषादी च दु:खशोकाभिपीडितः । एवं जन्मत्रयं प्राप्य भवेत्तस्य च निष्कृतिः ॥२०॥ मुष्टिचपेटकीलैश्च हन्याद्विप्रं तु यः पुमान्। तापने रौरवे घोरे कल्पांतं सोपि तिष्ठति॥२९॥ अथ जन्मसमासाद्य कुक्कुरः क्रूर चंडकः । अंत्यजातिषु जातोपि दरिद्रः कुक्षिशूलवान्॥२२॥ पादमुद्यच्छते वा यस्तस्य पादे शिलीपदः। खंजो वा मंदजंघो वा खंण्डपादो भवेन्नरः॥२३॥ पक्षवातेन चांगानि प्रकंपंते सदैव हि । मातरं पितरं विप्रं स्नातकं च तपस्विनम्॥२४॥ हत्वा गुरुगणं क्रोधात्कुंभीपाके चिरंभवेत्। उषित्वा चैव जायेत कोटजातिषु तत्परम् ॥२५॥ विरुद्धं परुषं वाक्यं यो वदेद्धि द्विजातिषु । अष्टौ कुष्टाः प्रजायंते तस्य देहे दृढं सुत ॥२६॥ विचर्चिकाथ दद्रूश्च मंडलः शुक्तिसिध्मकौ। कालकुष्ठस्तथाशुक्लस्तरुणश्चातिदारुणः ॥२७॥ ततोभिषक प्रयोगे च पापात्पुण्यं पलायते । अपुण्याज्जलरेखेव तेनैव निधनं व्रजेत् ॥२८॥ भूख से व्याकुल महापुरुष ब्राह्मणों की पूजा भक्तिपूर्वक तथा श्रद्धा पूर्वक नहीं करता है, वह नरक में जाता है ॥१४॥ जो व्यक्ति कठोर वाणी से डाँटकर क्रोध आदि करके ब्राह्मणों को भगा देता है, वह भयङ्कर रौरव नरक में जाता हे॥१५॥ उन नरकों से निकल कर वह कीडा आदि होता है, फिर शूद्र योनि में जन्म लेता है । उसके बाद वह रोगी और दरिद्र होता है, भूख से पीडित होता है ॥१६॥ अतएव घर आये हुए भूखे ब्राह्मण का कभी अपमान नहीं करना चाहिए । जो देवता, अग्नि तथा ब्राह्मणों को देने से इनकार कर देता है वह ॥१७॥ सैकड़ों पशुपक्षियों की योनि में जन्म लेकर चाण्डाल योनि में जन्म लेता है । जो व्यक्ति अपना पैर उठाकर ब्राह्मण, गौ, माता-पिता तथा गुरु को मारता है ॥१८॥ उसका रौरव नरक में निरन्तर निवास होता है उसका कभी उद्धार नहीं होता है । यदि किसी पूर्व पुण्य के कारण उसका मनुष्यों की योनि में जन्म भी होता है तो वह लंगड़ा होता है ॥१९॥ वह अत्यन्त दीन, विषाद करने वाला तथा दुःख एवं शोक से पीडित होता है । इस तरह से तीन जन्मों के बाद उसका प्रायश्चित हो जाता है ॥२०॥ जो ब्राह्मण को मुक्के से, थप्पड से, कील ठोक कर मारता है, वह एक कल्प पर्यन्त भयङ्कर संतप्त रौरव नरक में निवास करता है ॥२१॥ उसके बाद जन्म पाकर वह कुत्ता होता है, क्रूर चाण्डाल होता है, शूद्र योनि में जन्म पाता है, तो उसके पेट में सदा शूल होता रहता है ॥२२॥ जो ब्राह्मणों को पैर उठाकर दिखाता है उसके पैर में शोथ रोग होता है । वह या तो लंगड़ा होता है अथवा कमजोर जंघों वाला होता है, अथवा उसका पैर कट जाता है ॥२३॥ पक्षाघात रोग से उसके पाप से उसके अङ्ग काँपने लगते हैं । माता, पिता, ब्राह्मण, स्नातक तथा तपस्वी ।।२४॥ को मारकर गुरुजनों के क्रोध के कारण दीर्घ काल तक कुम्भीपाक नामक नरक में जाता है । उस नरक में रहने के बाद वह कीडा होता है ॥२५॥ जो ब्राह्मणों के विरुद्ध बोलता है, कठोर वाणी बोलता है, उसके शरीर में निश्चित रूप से आठो प्रकार के कुष्ठ (कोढ) होते हैं ॥२६॥ विचर्चिका, दाद, मण्डल, शुक्तिका, सिध्मक (सिहुला) कालकुष्ठ, शुक्लकुष्ठ (श्वित्र) तथा भयङ्कर तरुणकुष्ठ ये आठ प्रकार के कुष्ठ (कोढ) हैं ॥२७॥ उसके बाद दवा के प्रयोग के द्वार पाप के कारण पुण्य भाग जाता है । पाप के ही कारण जल की रेखा के समान कुष्ठ होता है और
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