Srishti Khanda Extracted Page 679

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-679

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Sanskrit Original

तेषां मुखे ददौ हृष्टा क्ष्वेडं चांमृतलक्षणम् । तानुवाच प्रसूः पुत्रान्युष्पाकं च कुले सदा॥१६६॥ मुखेतिष्ठन्त्वमीदैवा बिंदव स्तेननिर्वृताः । महर्षयस्ततो देवाः सिद्धगंधर्वमानुषा: ॥१६७॥ ऊचुः स्सन्तु कुले मातरस्माकं च प्रसादतः। नागैर्विसर्जिता देवाः ससिद्धा गुनयस्तथा ॥१६८॥ जग्मुः स्वमालयं हृष्टा नागाः प्रमुदिताः स्थिताः। एतस्त्नितरे नागां श्रखाद गरुडो बलात् ॥१६९॥ दिक्षु पलायिताः शेषाः पर्वतेषु वनेषु च सागरेषु च पाताले बिलेषु तरुकोटरे ॥१७०॥ निभृतेषु निकुञ्जेषु स्थिताः सर्पाश्च निर्वृताः । भुजगास्तस्य भक्ष्याश्जच सदैवविधिनिर्मिताः ॥१७१॥ स खादयित्वा नागांश्च संभाष्य पितरावथ। विबुधान्पूजयित्वा तु जगामहरिमव्ययम् ॥१७२॥ यःपठेच्छ्णुयाद्वापि सुपर्णचरितं शुभम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सुरलोके महीयते॥१७३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गरुडोत्पत्तिनाम सप्तचत्वारिंशत्तमोध्यायः ॥४७॥ —— ae अड़तालिसवाँ अध्याय ब्रह्मोवाच अतः परं तु विप्रर्षे चांडालपतितोद्विजः। प्रलप्य च बहून् शोकान् जगाम कश्यपं मुनिम्॥१॥ इस बात को कड्रू भी नहीं जान सकी । प्रसन्न होकर कद्रू ने अपने पुत्रों को बुलाकर ॥ १६४-१६५।। उसने सबों के मुख में विष को अमृत समझकर डाल दिया । उन सबों को कद्रू ने कहा तुमलोगों के कुल में ये दैव विन्दु सर्वदा निवास करे उससे महर्षिगण, सिद्ध तथा गन्धर्वगण एवं मनुष्य प्रसन्न हो गये ॥१६६-१६७॥। सर्पो ने कहा माँ तुम्हारी कृपा से यह हमारे वंश में सदा बना रहे । नागों ने सिद्धों, महर्षियों तथा देवताओं को विदा किया ॥१६८॥ सबके सब प्रसन्न होकर अपने घर चले गये और नाग प्रसन्नता पूर्वक वहाँ बने रहे । उसी समय गरुड ने बल पूर्वक नागों को खा लिया ॥१६९॥ जो बच गये थे वे दिशाओं, वनों तथा पर्वतों में, सागर में, पाताल में, विलों में, पेड़ों के कोटरों में भागकर चले गये ॥१७०॥ सुनसान निवुज्ञों में सर्प शान्ति पूर्वक रहने लगे । ब्रह्माजी ने सर्पो को गरुड़ का सदा के लिए भक्ष्य बना दिया ॥१७१॥ गरुड नागों को खाकर तथा अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर, देवताओं की पूजा करके अव्यय श्रीभगवान् के पास चले गये ॥१७२॥ जो व्यक्ति इस गरुड के चरित को पढ़ता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर देवलोक में पूजित होता है ॥१७३॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के गरुडोत्पत्ति नामक सैंतालिसवें अध्याय काशिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४७।। —— Oe महर्षि कश्यप के उपदेश से चाण्डाल पतित ब्राह्मण को सदाचार पालन करने से स्वर्ग की प्राप्ति, ब्राह्मण को पीडित करने से अनेक प्रकार के दुःखों की प्राप्ति का वर्णन, ब्राह्मणों की उपजीव्यवृत्ति का वर्णन, सत्य की प्रशंसा, गौ का माहात्म्य तथा कपिला गौ के दान इत्यादि की विधि ब्रह्माजी ने कहा-- उसके प्रश्नात् चाण्डालों के बीच में पड़कर वह ब्राह्मण विप्रर्षि कश्यप के समक्ष अनेक प्रकार से अपने अनेक दोषों का वर्णन करके महर्षि कश्यप की शरणागति किया ॥१॥ उन मुनिश्रेष्ठ के सन्निकट में

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