Srishti Khanda Extracted Page 678

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-678

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Sanskrit Original

नखैरशनिसंकाशैर्बिभेदे गरुडो गजम् । मातलिं च रथं चक्रं तथादेवान्पुरस्सरान् ॥१५३॥ व्यथितो सौ महाबाहुर्मातलिर्गजपुंगवः । विमुखाः पक्षवातेन सर्वे देवगणास्तदा ॥१५४॥ ततस्तु कोपितो जिष्णुर्जघान कुलिशेन तम् । कुलिशस्यावपातेन न च क्षुब्धो महाखगः ॥१५५॥ स्वं मोघं भिदुरं दृष्ट्वा हरिभीतो भवत्तदा । संनिवृत्य ततो युद्धाततत्रैवांतरथीयत ॥१५६॥ सुतरामपि गच्छतं वेगाद्धूतलमागतः । अब्रवीत्ससुर श्रेष्ठः सर्वदेवगणाग्रतः ॥९५७॥ शक्र उवाच यदि दास्यसि पीयूषमिदानीं नागमातरि । भुजगाश्चामराः सर्वे क्रियन्ते हि ध्रुवं तया॥१५८॥ प्रतिज्ञा ते भवेन्नष्टा न फलं जीवितस्य ते । तस्मादिदं हरिष्यामि संमतेन तवानघ ॥१५९॥ गरुत्मानुवाच यस्मिनुकालेह्यदासी सा माता मे दुःखिता सती। विदिता सर्वलोकेषु हरेऽमृतं हरिष्यसि॥१६०॥ ऋषय ऊचुः एवमुक्त्वा महावीर्यो गत्वोवाच प्रसूं तदा । गरुड उवाच आनीतममृतं मातस्तस्या एव प्रदीयताम् ॥१६९॥ प्रोत्फुल्ल्हदया सा च दष्ट्वा पुत्रं सहामृतम्। तामाहूयामृतं दत्वा चादासीतां तदागता ॥१६२॥ तृणकाष्ठानि भूतानि पशवश्च सरीसृपाः। | हृष्टवा सविस्मयास्सरवे देवामहर्षयस्तदा ॥१६३॥ मोचयित्वा तु तामंबां गरुडः सुष्ठुतां गतः । एतस्मिन्नंतरे शक्रो जहारसहसा सुधाम् ॥१६४॥ निधाय गरलं तत्र तया चानुपलक्षितः । प्रहष्टहृदया कद्रूः पुत्रानाहूय॒ संभ्रमात्॥१६५॥ तीक्षण बाणों का प्रहार किया । जैसे सुमेरु पर्वत के शिखर पर मेघ वर्षा कर रहा हो ॥१५२॥ गरुड ने भी अपने वज्र तुल्य नखों से हाथी को छेद दिया । मातलि, रथ, चक्र, तथा जो देवता सामने आये उन सबों को उन्होंने छेद दिया॥१५३॥ हाथी और महाबाहु मातलि दोनो घायल हो गये । पंख की वायु के कारण सभी देवतागण पराङ्मुख हो गये ॥१५४॥ उसके बाद क्रोध करके इन्द्र ने वज्र से गरुड पर प्रहार किया । किन्तु महाखग वज्र के प्रहार से क्षुब्ध नहीं हुए ॥१५५॥ अपने वज्र को व्यर्थ होते देखकर इन्द्र डर गये । वे युद्ध करना बन्द करके अन्तर्धान हो गये॥ १५६॥ अत्यन्त वेग से जाते हुए गरुड के साथ वे वेग से पृथिवी पर आये । सभी देवताओं के आगे आकर देवश्रेष्ठ इन्द्र ने कहा ॥१५७॥।। शक्र ने कहा-- यदि तुम नागमाता को पीयूष (अमृत) दे दोगे तो वह सभी सपों को अमर बना देगी ॥१५८॥ तुम्हारी सर्पो को खाने की प्रतिज्ञा नष्ट हो जायेगी अतएव तुम्हारे जीवन का कोई फल नहीं होगा । अतएव हे अनघ ! तुम्हारी सम्मति से मैं इस अमृत का हरण कर लूँगा ॥१५९॥ गरुड ने कहा-- इन्द्र जिस समय मेरे दुःखिता माता दासित्वरहित रूप से लोकों में ज्ञात हो जाय उस समय तुम अमृत का हरण कर लो ॥१६०॥ ऋषियों ने कहा-- इसतरह से कहकर महाबलवान् गरुड ने अपनी माता से कहा माँ मैंने अमृत ला दिया; इसे तुम उसको (क्रदू को) दे दो ॥१६१॥ अमृत के साथ आये हुए पुत्र को प्रसन्न हृदय से देखकर विनता ने क्रदू को बुलाकर उसे अमृत दे दिया और दासित्व से मुक्त हो गयी ॥१६२॥ इस घटना को देखकर तृण, काष्ठ, सभी जीव, पशु, सर्प तथा महर्षिगण सभी आश्चर्यित हो गये ॥१६३॥ अपनी माता को दासित्व से मुक्त कराकर गरुड प्रसन्न हो गये । इसी बीच में इन्द्र, अमृत के स्थान पर विष को रखकर अमृत का अपहरण कर लिए ।

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