Srishti Khanda Extracted Page 677
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-677
Sanskrit Original
गरुड उवाच अमृतं चानयिष्यामि मातुरर्थेऽ धुनाऽ नघ ॥१४०॥ स तस्य वचनं श्रुत्वा मुनिः प्राह खगेश्वरम् । सत्यलोकस्य वै चोर्ध्वे विश्वकर्मविनिर्मिता ॥१४१॥ पुरी चास्ति सभा रम्या देवानां हितहेतवे। वह्निप्राकारदुर्लभ्या दुर्धर्षाचासुरैः सुरैः ॥१४२॥ रक्षार्थं निर्मितो देवः सुरैस्तत्र महाबलः। यं यं पश्यति वीरः स स एवभस्मतां व्रजेत्॥१४३॥ सुपर्ण उवाच नारायणाद्दरो लब्धो मया च मुनिसत्तम। भयं नास्तीह मे तात सुरासुरगणादपि ॥१४४॥ एवमुक्त्वा गरुत्मान्स उद्धूत्यसागराज्जलम् । जगामाकाशमाविश्य खगश्चोर्ध्वं मनोजवः ॥१४५॥ पक्षवातेन तस्यैव रजः समुद्गतंबहु । तस्यांतिकं न च त्यक्तमगमत्तस्य तच्चयः॥९४६॥ गत्वा चंचू जलेनापि वह्निनिर्वापयद्दली । रजोभिः परिपूर्णाक्षो न सुरस्तं च पश्यति॥९४७॥ जघान रक्षिवर्गास्तानमृतं चाहरद्वली । आनयंतं च पीयूषं खगं गत्वा शतक्रतुः ॥९१४८॥ ऐरावतं समारूढो वाक्यमेतदुवाच ह । इन्द्र उवाच खगरूपधरः कस्त्वं पीयूषं हरसे बलात् ॥१४९॥ अप्रियं सर्वदेवानां कृत्वा जीवे रतिःकथम् । विशिखैरम्निसंकाशैर्नयामि यम मंदिरम् ॥१५०॥ शरुत्वा वाक्यं हरेः कोपादुवाच स महाबलः । गरुड उवाच नयामि तव पीयूषं दर्शयस्व पराक्रमम् ॥१५१॥ ऋषि उवाच एतच्छुत्वा महाबाहु र्जघानविशिखैः शितैः । यथामेरुगिरि: शृंगं तोयवर्षेण तोयद: ॥९५२॥ सुनकर मुनि ने गरुड से कहा-- सत्यलोक के ऊपर विश्वकर्मा ने देवताओं का कल्याण करने के लिए एक नगरी का निर्माण किया है । उसमें मनोहर सभा है । उसके चारो ओर अग्नि की चाहारदिवारी है । उसमें देवता और असुर कोई प्रवेश नहीं कर सकता है ॥१४१-१४२॥ वहाँ*पर रक्षा करने वाला देवता महाबलवान् है, वह जिसको-जिसको देखता है वह-वह भस्म हो जाता है ॥१४३॥ सुपर्ण ने कहा-- हे मुनिश्रेष्ठ मैने भगवान् नारायण से वरदान प्राप्त किया है । अतएव मुझे किसी देवता अथवा असुर से काई भय नहीं है ॥१४४॥ इसतरह से कहकर गरुड सागर से जल निकाल कर मन के समान वेग पूर्वक ऊपर आकाश में चले गये ॥१४५॥। उनके पङ्क की वायु से बहुत अधिक धूलि उड़ी और गरुड़ के साथ ही धूलि समूह भी गया ॥१४६॥ वहाँ जाकर उन्होंने अपनी चोंच के जल से अग्नि को बुझा दिया धूलि से परपिर्ण पंख वाले गरुड को वह रक्षक देवता नहीं देख सका ॥१४७॥ उन्होंने रक्षको को मार दिया और अमृत का हरण कर लिया । अमृत लाने वाले गरुड के पास इन्द्र गये ॥१४८॥ वे ऐरावत पर बैठे थे और बोले इन्द्र ने कहा-- तुम पक्षी रूपधारी कोन हो कि अमृत का बलपूर्वक हरण कर रहे हो ।।१४९॥ सभी देवताओं का अप्रिय कार्य करके तुम कैसे जीवित रह सकते हो ? तुमको अग्नि के सदृश बाणों से यमलोक भेज रहा हूँ ॥१५०॥ ऋषियों ने कहा-- इन्द्र की बात को सुनकर महाबलवान् गरुड ने कहा गरुड ने कहा- में तुम्हारे अमृत को ले जा रहा हूँ तुम अपना पराक्रम दिखाओ ।।१५१॥ ऋषियों ने कहा-- इसबात को सुनकर इन्द्र ने
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