Srishti Khanda Extracted Page 676
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-676
Sanskrit Original
उषःकालेऽवदत्सा च अश्वोयं कृष्णतां ब्रजेत् । ततोऽहमवदं तत्र सदा चायं रुचासितः॥१३०॥ मिथ्या ते वचनं मातः प्रतिज्ञां साकरोत्तदा । ततोहमब्रुवं कब्रूं शपथं नागमातरम्॥१३१॥ यदीमं कृष्णताभ्येति हरेरश्वमहं तदा। कृता भवामि ते दासीत्यहमेतत्तदाऽवदम् ॥१३२॥ ततस्तस्मिन् हरेरश्चे कृतेकृष्णे च कृत्रिमैः । तस्याः पुत्रैश्च धूर्तैश्च दासीत्वमगमं तदा ॥१३३॥ यस्मिन्कालेह्याभीष्टञ्च तस्य द्रव्यं ददाम्यहम्। तस्मिन्काले ह्यदासीत्वं यास्यामि कुलनंदन ॥१३४॥ गरुड उवाच पृच्छ शीघ्रं च मातस्तां करिष्यामि प्रतिक्रियाम्। भक्षयिष्यामि तान्नागान्प्रतिज्ञा मे यथार्थतः ॥१३५॥ ऋषय ऊचुः ततः कट्टुमुवाचेदं विनतादुःखिता सती । विनतोवाच अभीष्टं वदकल्याणि येन मुच्येय कृच्छ्तः ॥१३६॥ ऋषय ऊचुः अब्रवीत्सा दुराचारा पीयूषं दीयतामिति । एतच्छुत्वा तु वचनमभवत्सा च निष्प्रभा ॥१३७॥ तत: शनैरुपागम्य तनयं प्राह दुःखिता । विनतोवाच अमृतं प्रार्थयत्पापा तात किं वा करिष्यसि ॥१३८॥ ऋषय ऊचुः श्रुत्वा वाक्यं गरुत्मांश्च महाक्रोधसमन्वितः। अमृतं चानयिष्यामि मातर्माविमुखी भव ॥१३९॥ ऋषय ऊचुः एवमुक्ता तु तरसा स गतः पितुरंतिकम् । काला बना दिया । प्रातःकाल उसने कहा यह अश्व काला हो गया । यह अश्व तो सदैव धवल कान्ति वाला रहता हे ॥१२९-१३०॥। उसने प्रतिज्ञा की कि तुम्हारी बात झूठी है । तब मैने क्रुद्ध होकर क्रदु से शपथ करके कहा।।१३१॥ यदि यह सूर्य का घोड़ा काला हो जाय तो मैं तुम्हारी दासी बन जाऊंगी ॥१५३२॥ उसके बाद उसके पुत्रों द्वारा अश्व जब कृत्रिम रूप से काला हो गया तो मैं कद्रू की दसी बन गयी ॥१३३॥ उसको जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसी समय यदि मैं उसको वह वस्तु लाकर दे देती हूँ तो मैं उसके दासित्व से मुक्त हो जाऊंगी। १३४।। गरुड ने कहा-- माँ ! उससे तुम पूछो मैं उस कार्य को करूँगा । में यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि में उन नागों को खां जाऊँगा ।।१३५।। ऋषियों ने कहा-- उसके बाद दु:खिनी विनता क्रदू से बोली विनता ने कहा-_ हे कल्याणि ! तुम अपना अभीष्ट बतलांओ जिससे मैं इस कष्ट से छुटकारा पाऊं ॥१३६॥ उस दुष्टा ने कहा कि मुझे अमृत लाकर दो । ऋषियों ने कहा-- इस बात को सुनकर विनता उदास हो गयी ॥१३७॥ वह धीरे से अपने पुत्र के पास आकर बॉली विनता ने कहा-- पुत्र ! वह अमृत माँगती है, तुम क्या कर सकते हो?।।१३८।। ऋषियों ने कहा-- उस बात को सुनकर गरुड अत्यन्त क्रुद्ध होकर कहे, माँ में अमृत लाऊंगा, तुम दुःखी मत होओ ।॥१३९।। ऋषियों ने कहा-- यह कहकर गरुड वेगपूर्वक अपने पिता के पास गये गरुड़ ने कहा हे पित: ! अपनी माता के लिए मैं अमृत लाऊँगा ॥१४०॥ ऋषियों ने कहा-- गरुड़ की वाणी को
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