Srishti Khanda Extracted Page 675
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-675
Sanskrit Original
ऋषय ऊचुः गृहीत्वा जनकस्याज्ञां लब्ध्वा विष्णोर्वरं महत् ॥१२१॥ अंबापार्श्व गतो हृष्टस्तां प्रणम्याग्रतः स्थितः । विनतोवाच अभवद्धोजनं तेऽद्य पुत्र दृष्टः पितापि च ॥९२२॥ किमर्थ वा विलंबस्ते चिंतया व्यथिताह्यहम् । ऋषय ऊचुः स मातुर्वचनं श्रुत्वा गरुडः प्रहसन्निव ॥९२३॥ कथयामास वृत्तांतं सा श्रुत्वा विस्मिताभवत्। | विनतोवाच कथंच दुःष्करं कर्मशिशुभावात्त्वया कृतम् ॥१२४॥ धन्याहं मे कुलं धन्यं यस्त्वं विष्णुसखोऽ भवः। लब्ध्वा वरं महात्मानं दृष्ट्वा मे हृष्यते मनः ॥१२५॥ पौरुषेण त्वया वत्स उद्धूतं मे कुलद्वयम्। सुपर्ण उवाच मातः किं ते करिष्यामि प्रियमेव तदुच्यताम् ॥१२६॥ कार्य कृत्वाथ यास्यामि पार्श्व नारायणस्य च। ऋषय ऊचुः एतच्छुत्वा तु सा प्राह गरुडं विनता सती ॥९२७॥ महद्दुःखं च मे चास्ति कुरु तात प्रतिक्रियाम्। भगिनी मे सपत्नी सा पणिताहं तया पुरा ॥१२८॥ तस्या दास्यमहं प्राप्ता कस्तारयति मामितः । कृष्णं कृत्वाविषैरश्वं तस्याः पुत्रै र्महोरगैः ॥९२९॥ तो वे विशेष रूप से प्राप्त हैं तुम अपनी माता को उनकी सौत के घोर कष्ट से मुक्त करो ॥१२०॥ अपनी माता को प्रसन्न करके तुम भगवान् विष्णु के पास जाना । ऋषियों ने कहा-- अपने पिता की आज्ञा प्राप्त करके तथा भगवान् विष्णु से वरदान प्राप्त करके ॥१२१॥ गरुड प्रसन्नता पूर्वक अपनी माता के पास गये और उनको प्रणाम करके खड़े हो गये । विनता ने कहा-- पुत्र ! क्या तुम्हारा भोजन हुआ ? क्या तुम्हारे पिता प्रसन्न हैं ?॥१२२॥ तुम्हारे आने में विलम्ब कैसे हुआ ? इसी चिन्ता से मैं दुःखी थी ऋषियों ने कहा-- अपनी माता की बातों को सुनकर गरुड हँसते हुए ॥१२३॥ सारा वृत्तान्त सुनाये, उसको सुनकर विनता आश्चयर्यित हो गयीं । विनता ने कहा-- तुम अभी बच्चे हो इस दुष्कर कार्य को तुमने कैसे किया 2॥१२४॥ मैं धन्य हुँ, मेरा वंश धन्य है,क्योंकि तुम भगवान् विष्णु के सखा हो गये । तुमने वरदान प्राप्त किया है, तुम महापुरुष हो, तुम्हें देखकर मेरा मन प्रसन्न हो रहा है ॥१२५॥ हे वत्स ! तुमने अपने पौरुष से मेरे दोनों वंशों का उद्धार कर दिया । सुपर्ण ने कहा-- माँ ! मैं तुम्हारा कौन सा प्रिय कार्य करूँ ? यह बतलाओ ॥१२६॥ तुम्हारा कार्य पूरा करके में भगवान् नारायण के पास जाऊंगा ऋषियों ने कहा-- इस बात को सुनकर सती विनता ने गरुड से कहा ॥१२७॥ हे तात ! मुझको बहुत बड़ा दुःख है, उससे मेरा उद्धार करो । मेरी बहन मेरी सौत हे । उसने मुझसे शर्त लगाया ॥१५२८॥ मैं उसकी दासी बन गयी, उससे मेरा उद्धार कौन करा सकता है ? अपने पुत्र बड़े-बड़े सर्पो के द्वारा सूर्य के घोड़ों को उसने
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know