Srishti Khanda Extracted Page 674
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-674
Sanskrit Original
प्रार्थयित्वा च पितरावागमिष्यामि तेन्तिकम्। प्रीतो विष्णुरुवाचेदे भव त्वमजरामरः ॥१०७॥ अवध्यः सर्वभूतेभ्यः कर्मतेजश्च मत्समम् । सर्वत्र तेगतिश्चास्तु निखिलं तु सुखं श्रुवम् ॥१०८॥ संमिलतु द्रुतं सर्व यत्ते मनसि वर्तते। यथेष्टं प्रीतिमाहारमकष्टेन प्रलप्स्यसे॥१०९॥ व्यसनान्मातरं सद्यो मोचयिष्यसि नान्यथा । एवमुक्तुवा हरिः सद्यस्तत्रैवांतरधीयत ॥१९०॥ ताक्ष्योपि पितरं गत्वा कथयच्चाखिलं ततः । स तच्छुत्वा प्रहृष्टात्मा तनयं पुनरब्रवीत् ॥९११॥ कश्यप उवाच धन्योऽहं च खगश्रेष्ठ धन्या ते जननी शिवा । धन्यं क्षेत्रं कुलं चैव यस्य पुत्रस्त्वमीदृशः ॥१९२॥ यस्य पुत्रः कुले जातो वैष्णवः पुरुषोत्तमः | कुलकोटिं समुद्धृत्य विष्णुसायुज्यतां ब्रजेत् ॥११३॥ विष्णुं यः पूजयेन्नित्यं विष्णुं ध्यायेत गायति । जपेन्मंत्रं सदाविष्णोः स्तोत्रं तस्य पठिष्यति॥११४॥ प्रसादं च भजेन्नित्यमुपवासं हरेर्दिने । क्षयाच्चसर्वपापानां मुच्यते नात्र संशयः ॥११५॥ यस्य तिष्ठति गोविंदो मानसे च सदैव हि। स एव च लभेद्दास्यं स पुण्यैः पुरुषोत्तमः ॥११६॥ जन्मकोटिसहस्रेभ्यः कृत्वा सत्कर्मसंचयम् । क्षयाच्च सर्वपापानां विष्णोः किंकरतां ब्रजेत् ॥१९७॥ धम्योऽसौ मानवो लोके विष्णोस्सादृश्यमाव्रजेत् । नित्यः सुरवरैः पूज्यो लोकनाथोऽच्युतोव्ययः॥९९८॥ सुप्रसन्नो भवेद्यस्य स एव पुरुषोत्तमः । तपोभिर्बहुभिर्धमं मखैर्नानाविधैरपि ॥१९९॥ विष्णुर्न लभ्यते देवैस्त्वयासौ विप्रलभ्यते। सपत्मीव्यसनाद् घोरान्मातरं ते प्रमोचय ॥१२०॥ ततो यास्यसि देवेशं कृत्वा मातुः प्रतिक्रियाम्। आपके पास आऊंगा । प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने कहा-- तुम अजर अमर हो जाओ ॥१०७॥ तुम सभी जीवों के लिए अवध्य हो और तुम्हारा कर्म एवं तेज मेरे ही समान हो जाय । तुम्हारी गति सर्वत्र हो, तुम्हे सभी सुख प्राप्त हों ॥१०८॥ तुम्हारे मन में जो आये वह तुम्हे शीघ्र ही प्राप्त हो जाय । तुम अपने मनोनुकूल यथेष्ट आहार प्राप्त करोगे ॥१०९॥ तुम शीघ्र ही अपनी माता को कष्ट से रहित करोगे । ऐसा कहकर श्रीहरि वहाँ से अन्तर्धान हो गये॥११०॥ गरुड भी अपने पिता के पास जाकर सारा वृत्तान्त सुनाये । उसको सुनकर प्रसन्न हुए महर्षि ने गरुड से कहा ॥१११॥ कश्यप महर्षि ने कहा- हे पक्षिश्रेष्ठ ! मैं धन्य हो गया और तुम्हारी मंगलमयी माँ भी धन्य हो गयी । जिसमें तुम जैस पुत्र है, वह क्षेत्र और वंश भी धन्य हो गया ॥११२॥ जिसके वंश में पुरुषोत्तम वैष्णव पुत्र उत्पन्न होता है, वह अपने करोड़ों पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है॥११३॥ जो नित्य ही भगवान् विष्णु की पूजा करता है, विष्णु का ध्यान करता है, उनका गायन करता है, सदा भगवान् विष्णु के मन्त्र का जप करता है और उनके स्तोत्रों का पाठ करता है ॥११४॥ प्रतिदिन उनकी कृपा प्राप्त करता है एकादशी के दिन उपवास करता है । उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं वह मुक्त हो जाता है; इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥११५॥ जिसके मन में सदा गोविन्द का निवास होता है वही पुरुष श्रेष्ठ अपने पुण्यों के कारण श्रीभगवान् की दासता को प्राप्त करता है ॥११६॥ करोड़ो हजार जन्मों में किए गये पुण्य समूह से तथा पापों के विनष्ट हो जाने से ही भगवान् विष्णु की किंकरता प्राप्त होती है ॥११७॥। वह पुरुष धन्य हो जाता है, वह भगवान् विष्णु के सदृश हो जाता है । बड़े-बड़े देवता उसकी पूजा करते हैं । लोकनाथ, निर्विकार भगवान् अच्युत जिस पर प्रसन्न हो जाते हैं, वही पुरुषोत्तम है । अनेक प्रकार की तपस्याओं, धर्मा तथा अनेक प्रकार के यज्ञं के द्वारा भी ॥११८-११९॥ भगवान् विष्णु की प्राप्ति नहीं हो पाती है, देवता भी उनको नहीं प्राप्त कर पाते हैं और तुम्हे
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