Srishti Khanda Extracted Page 673

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-673

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Sanskrit Original

शाखापतनमात्रेण सचराचरकानना । चचालवसुधा चैव सागराः प्रचकंपिरे ॥९७॥ ततश्च खादितौ सत्त्वौ सहसा गजकच्छपौ । तृप्तिं न प्राप्तवान्सोऽपि क्षुधा तस्य न शाम्यति॥९८॥ एतज्ज्ञात्वा तु गोविंदस्तमुवाचखगेश्वरम् । भुजस्य मम मांसं तु भक्षयित्वा सुखी भव ॥९९॥ ऋषय ऊचुः इत्युक्ते प्रचुरं मांसं भुजस्य तस्य तेन हि । खादितं क्षुधया पुत्र ब्रणं तस्य न विद्यते ॥१००॥ वैनतेय उवाच तमुवाच महाप्राज्ञश्चराचरगुरुं हरिम् । कस्त्वं किं वा प्रियं तेऽद्य करिष्यामि च सांप्रतम्॥१ ० १॥ नारायण उवाच विद्धि नारायणं मां हि त्वत् प्रियार्थं समागतम्। ऋषय ऊचुः रूपं स्वं दर्शयामास प्रत्ययार्थं च तस्य वै ॥१०२॥ पीतवस्रं घनश्यामं चतुर्भुजमनोहरम् । शंखचक्रगदापद्मधर सर्वसुरेश्वरम् ॥१०३॥ तं च दृष्ट्वा गरुत्मांश्च प्रणम्य शिरसा हरिम् । प्रियं किं ते करिष्यामि वद नः पुरुषोत्तम ॥९०४॥ ऋषय ऊचुः र तमब्रवीन्महातेजा देवदेवेश्वरो हरिः। विष्णुरुवाच भव मे वाहनं शूर सखे त्वं सार्वकालिकम् ॥१०५॥ ऋषय ऊचुः तमुवाच ख्गश्रेष्ठो धन्योऽहं विबुधेश्वर । सफलं जन्म मे नाथ त्वां दृष्ट्वाद्या मे प्रभो १०६॥ है, यह कहकर गरुड उस भुजा पर बैठ गये ॥९५॥ पक्षिराज के बैठने पर भुजा में कँप भी नहीं हुआ, उस पर बैठकर उन्होंने उस शाखा को पर्वत पर छौड़ दिया ॥९६। शाखा के गिरने मात्र से चराचर जीवों और पर्वतों के साथ पृथिवी काँप गयी और सगर में तूफान आ गया ॥९७॥ उसके बाद में उन्होंने विशालकाय हाथी और कच्छप को खा लिया, किन्तु वे उतने से तृप्त नहीं हुए और उनकी भूख नहीं मिटी ।९८॥ इस बात को जानकर उन्होंने उस खगेश्वर से कहा विष्णु ने कहा मेरी भुजा के माँस को खाकर पेट भर लो ॥९९॥ ऋषियों ने कहा-- भगवान् के इस तरह से कहने पर गरुड ने भुजा के प्रचुर माँस को खाया, किन्तु उसमें कोई घाव नहीं हुआ ॥१००॥ उस महाबुद्धिमान ने चराचर के स्वामी श्रीहरि से कहा वैनतेय ने कहा-- आप कौन है ? मैं आपकी कौन सी सेवा करूँ 2॥ १० १॥ नारायण ने कहा मैं नारायण हूँ तुम्हारा कल्याण करने के लिए आया हुँ ऋषियों ने कहा-- गरुड के विश्वास के लिए उन्होंने अपना रूप दिखाया ॥१०२॥ सभी देवताओं के स्वामी श्रीभगवान् शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए थे ॥१०३॥ उनको देखकर गरुड ने उनको शिर से प्रणाम किया । वैनतेय ने कहा-- हे पुरुषोत्तम ! आप बतलाइये कि मैं आपकी कौन सी सेवा करूँ ?।।१०४।। ऋषियों ने कहा-- देवताओं के भी आराध्य, महातेजस्वी श्रीहरि ने गरुड से कहा विष्णु ने कहा-- हे शूरवीर ! तुम मेरा सार्वकालिक वाहन और मित्र बनो । ऋषियों ने कहा-- उस पक्षिशरेष्ठ ने भगवान् विष्णु से कहा-- हे देवेश्वर मैं तो धन्य हो गया । हे प्रभो ! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया ॥१०६॥ मैं अपने माता-पिता से प्रार्थना करके

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