Srishti Khanda Extracted Page 672

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-672

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

विष्णुरुवाच कस्त्वं भ्रमसि चाकाशे किमर्थं पतगेश्वर ॥८ ४॥ विधृत्य महतीं शाखां महांतौ गजकच्छपौ । तमुवाच द्विजस्तस्मिन्नररूपधरं हरिम् ॥८ ५॥ गरुडोऽहं महाबाहो खगरूपः स्वकर्मणा । कश्यपस्य मुनेस्सुनूर्विनतागर्भसंभवः ॥८६॥ पश्यैतौ च महासत्त्वौ भक्षणार्थं मया धृतौ । न धरा च ममाधारो न वृक्षा न च पर्वताः ॥८७॥ अनेकयोजनान्यूर्थ्वं॑ दृष्ट्वा जंबुमहीरुहम् । अपतं तस्य शाखायां सहेमौ परि भक्षितुम् ॥८८॥ भग्ना सा सहसा शाखा तां च धृत्वा भ्रमाम्यहम् । कोटिकोटिसहस्राणां ब्राह्मणानां गवां वधात्॥८९॥ भयं तत्र विषादो मे सहसा प्राविशद्वुध । किं करोमि कथं यामि को मे वेगं सहिष्यति।९ ०॥ ऋषय ऊचुः इत्युक्ते पतगश्रेष्ठं प्रोवाचेदं हरिस्तदा । विष्णुरुवाच अस्मद्वाहुं समारुह्य भक्षेमौ गजकच्छपौ ॥९ १॥ गरुड उवाच ममाधारं न गच्छति सागराश्च नगोत्तमाः । अथ चैवं महासत्व कथंत्वं धारयिष्यसि ॥९२॥ ऋते नारायणादन्यः को मां धारयितुं क्षमः । त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेद्यो वेगं मे सहिष्यति॥९३॥ हरिरुवाच स्वकार्यमुद्धरेत्प्ाज्ञः स्वकार्यं कुरु सांप्रतम्। कृत्वा कार्यं खगश्रेष्ठ विजानीषे च मां ध्रुवम्॥९४॥ ऋषय ऊचुः महासत्वं च तं दृष्ट्वा विमृश्य मनसा खगः । एवमस्त्विति चोक्त्वा स॒ पपात ह महाभुजे ॥९५॥ न चचाल भुजस्तस्य सन्निपाते खगेशितुः । तत्र स्थित्वा स तां शाखां मुमोच पर्वतालये॥९६॥ पक्षिराज् ! आप कौन हैं ? और आकाश में इन कच्छप और महागज को पकड़कर क्यों भ्रमण कर रहे हैं ?॥८४॥ मनुष्य का रूप धारण किए हुए श्रीहरि से गरुड ने कहा हे महाबाहो ! मैं गरुड़ अपने कर्मों के कारण पक्षी शरीर वाला हूँ । में महर्षि कश्यप का पुत्र हुँ । मेरी माता का नाम विनता है ॥८५-८६॥ आप इन विशाल जीवों को देखें। इन दोनों को मैंने खाने के लिए पकड़ रखा है । मेरे भार को वृक्ष पर्वत तथा पृथिवी भी नहीं सम्हाल पाते हैं ॥८७॥ मैंने अनेक योजन विस्तृत जामुन के वृक्ष को देखकर इन दोनों को लेकर खाने के लिए उसकी शाखा पर बैठा॥८८॥ किन्तु वह शाखा भी टूट गयी उसको पकड़कर मैं धूम रहा हूँ । मुझे भय है कि इस शाखा के गिर जाने से करोड़ों गायों और ब्राह्मणों का वध हो जा सकता है । मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ? मेरे वेग को कौन सह सकता है ?॥८९-९०॥ ऋषियों ने कहा-- उस पक्षिश्रेष्ठ के इस तरह से कहने पर भगवान् विष्णु ने उससे कहा विष्णु भगवान् ने कहा-- तुम मेरी भुजा पर बैठ कर इन हाथी और कच्छप को खा लो ॥९१॥ गरुड ने कहा-- मेरे भार को सागर और श्रेष्ठ पर्वत भी नहीं धारण कर पाते है, इस महासत्त्व को आप कैसे धारण कर सकेंगे 2॥९२॥ भगवान् नारायण को छोड़कर कौन ऐसा पुरुष है जो मेरे वेग को धारण कर सके ॥९३॥ श्रीहरि ने कहा-- पहले बुद्धिमान को अपना कार्य करना चाहिए, इस समय तुम अपना काम करो । अपना कार्य करने के बाद तुम मुझको जान पाओगे ॥९४॥ ऋषियों ने कहा-- उस महासत्त्व को देखकर गरुड ने मन में विचार किया और कहा ठीक

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know