Srishti Khanda Extracted Page 671
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-671
Sanskrit Original
नैऋते कुवदाः पापा गोब्राह्मणवधोद्यताः । खर्पराः पश्चिमे पूर्वे निवसंति च दारुणाः ॥७१॥ वायव्यां च तुरुष्काश्च श्मश्रुपूर्णा गवाशिनः। अश्वपृष्टसमारूढाः प्रयुद्धेष्वनिवर्तिनः ॥७२॥ उत्तरस्यां च गिरयोम्लेच्छाः पर्वतवासिनः । सर्वभक्षा दुराचाराः बधबंधरताः किल ॥७३॥ ऐशान्यां निरयास्संति कर्तृणां वृक्षवासिनः। एते म्लेच्छस्थितादिक्षु घोरास्ते शस्त्रपाणयः ॥७४॥ येषां च स्पर्शमात्रेण सचैलो जलमाविशेत् । एतेषां च कलौ देशेप्यकाले धर्मवर्जिते॥७५॥ संस्पर्श च प्रकुर्वति वित्तलोभात्समंततः । म्लेच्छां स्तान्मोचयित्वा तु क्षुधया परिपीडितः ॥७६॥ पुनराह द्विजस्तातक्षुधा मे बाधतेतराम् । अवदद्वरुडं तत्र कश्यपः कृपया द्रुतम् ॥७७॥ कश्यप उवाच तिष्ठंतौ विपुलो तत्रजिघांस् गजकच्छपौ । अप्रमेयौ महासत्वौ सागरस्यैकदेशतः ॥७८॥ तावप्सु च द्रुतं वत्स क्षुधां ते वारयिष्यतः । ऋषय ऊचुः स पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्र गत्वाभिपद्य तौ | ॥७९॥ नखैर्भित्वा कूर्मगजौ महासत्वो महाजवः । खमुत्पपात तौ धृत्वा विद्युद्रेगो महाबलः ॥८०॥ आधारतां न गच्छंति नगाश्च मंदरादयः । ततो योजनलक्षे द्वे गत्वा मारुतरंहसा ॥८९॥ महत्यां जंबुशाखायां निपपात महाबल:। भग्ना सा सहसा शाखा तां पतंती खगेश्वरः ॥८ २॥ गोब्राह्मणवधाद्धीतो दधार तरसा बली। धृत्वा तां रुचिरं वेगादद्रवंतं खे महाबलम् ॥८ ३॥ गत्वा विष्णुरुवाचेदं नररूपधरो हरिः । बोलने वाले, गौओं तथा ब्राह्मणों का वध करने वाले वे पापी नैऋत्यकोण में चले गये । खर्पर जाति वाले पश्चिम और पूर्व दिशा में रहते हैं और भयङ्कर पापी हैं ॥७१॥ वायव्य कोण में तुर्क चले गये ये पूर्ण दाढी और मुच्छ वाले हैं तथा गौऔ को खाने वाले हैं । ये घोड़े की सवारी करते हैं, और युद्ध करने वाले होते हैं ॥७२॥ उत्तर के पर्वतों परपर्वतवासी म्लेच्छ रहते हैं वे सर्वभक्षी, दुराचारी, बांधने तथा बध करने का काम करते रहते हैं ॥७३॥ ईशान दिशा में वृक्षों पर रहने वाले और नरकवासी हैं । ये सभी म्लेच्छ घोर शस्त्रधारी और विभिन्न दिशाओं में रहने वालेहैं॥७४॥ इन सबों का स्पर्श हो जाने पर वस्र के साथ स्नान करना चाहिए । इन सबों का कलियुग में बुरे देश और काल में तथा धर्महीन देश में से ॥७५॥ स्पर्श लोग धन प्राप्ति के लोभ से करते हैं । उन म्लेच्छों का परित्याग करके गरुड फिर भूखे हो गये ॥७६॥ फिर उन्होंने कहा पिताजी मुझे जोर से भूख लगी है । कृपा करके कश्यप महर्षि ने गरुड को अद्भुत बात बतलायी ॥७७॥ कश्यप महर्षि ने कहा-- सागर के भीतर एक किनारे पर विशालकाय हाथी और कच्छप आपस में लड़ रहे हैं । एक दूसरे को मार डालना चाहते हैं ॥८७॥ हे वत्स ! उन दोनों से तुम्हारी भूख मिट जायेगी । ऋषियों ने कहा--- अपने पिता की वाणी सुनकर गरुड उन दोनों के पास चले गये ॥७९॥ महावेगवान् वे अपने नखों से कच्छप और हाथी को छेदकर उन दोनों को पकड़कर आकाश में उड़ गये।॥८०॥ मंदराचल आदि पर्वत गरुड के भार को नहीं सह पाते थे इसलिए वायु के वेग से दो लाख योजन जाकर ॥८१॥ महाबलवान् गरुड एक महान् जामुन के वृक्ष की शाखा पर बैठे तो वह शाखा टूट गयी, गिरती हुयी उस शाख को गरुड ने ॥८२॥ किसी गौ अथवा ब्राह्मण के वध के भय से अपनी चोच में पकड़ लिए और उसे पकड़कर आकाश में उड़ने लगे ॥८३॥ मनुष्य का रूप बनाकर भगवान् विष्णु गरुड के पास गये और कहे । हे
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know