Srishti Khanda Extracted Page 670
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-670
Sanskrit Original
पुरुषास्ते प्रतिष्ठंते घोरे च निरये ध्रुवम । चिराय निष्कृतिस्तेषां नैवास्तीह कथंचन ॥६०॥ सर्वाश्नैव. दुराचारांश्वांडालान्यापकारिण: । दोषांस्त्यक्त्वा नरः पश्चात्सुखी भवति नान्यथा॥६ ९॥ अज्ञानाद्यदि वा मोहात्कृत्वा पापं सुदारुणम् । ततो धर्म चरेद्यस्तु' सगच्छेत्परमां गतिम् ॥६२॥ पापकृन्न चरेद्धर्म पापे कुर्यान्मतिं पुन: | शिलानावं यथा रूढः सागरे सनिमज्जति ॥६३॥ कृत्वा सर्वाणि पापानि तथादुर्गतिसंचयम् । उपशान्तो भवत्पश्चात्तंदोषं शमयिष्यति ॥६४॥ ऋषय ऊचुः तमुवाच महाप्राज्ञं द्विजं मुनिवरोत्तमम्। विप्र उवाच यदिमां न जहातीह खगः सर्वाश्च बांधवान् ॥६५॥ ततःप्राणं च त्यक्ष्यामि खगे मर्मावघातिनि । नो चेत्त्यजतु मे बंधून्प्रतिज्ञा मे दृढात्मनः॥६६॥ ऋषय ऊचुः ततस्ताक्ष्यमुवाचेदं मुनिर्ब्रह्मवधे भयात् । कश्यप उवाच उद्दमैतान्सविप्रांश्च॒म्लेछानेतान् समंततः ॥६७॥ वनेषु पर्वतान्तेषु दिक्षु तान्पतगेश्वर । ऋषय ऊचुः उद्ववाम ततः शीघ्र दोषज्ञः पितुराज्ञया ॥६८॥ ततः सर्वेऽ भवन्व्यक्ता अकेशाः शमश्रुवर्जिताः । यवना भोजनप्रीताः किचिच्छमश्चुयुताश्च ये ॥६९॥ अग्नौ च नग्नकाः पापा दक्षिणस्यामवाचकाः । घोराः प्राणिवधे प्रीता दुरात्मानो गवाशिनः ॥७०॥ चाण्डालों से साथ पतित हो गये हो ॥५९॥ तुम्हारे पितृगण घोर नरक में हैं । उन लोगों के उद्धार का कोई भी साधन नहीं है ॥६०॥ पाप करने वाले, दुराचारी चाण्डालों का परित्याग करके मनुष्य सुखी हो जाता है, और दूसरा कोई साधन नहीं है ॥६१॥ अज्ञान अथवा मोह के कारण यदि कोई भयङ्कर पाप करता है तो धर्माचरण करके वह परमा गति को प्राप्त कर लेता है ॥६२॥ पापी धर्माचरण नहीं करता है, वह बार-बार पाप ही करता है । जिस तरह पत्थर की बनी नाव पर बैठने वाला व्यक्ति सागर में डूब जाता है, उसी तरह वह व्यक्ति भी पतित हो जाता है॥६३॥ सभी पापों को करके तथा दुर्गति के समूह को भी करके यदि कोई पाप करना छोड़ देता है तो उसके वे दोष शान्त हो जाते हैं ॥६४॥ ऋषियों ने कहा-- यह सुनकर उस ब्राह्मण ने महर्षि से कहा ब्राह्मण ने कहा-- यदि यह पक्षी मेरे बांधवों के साथ मुझे नहीं छोड़ता है ॥६५॥ तो मैं इस मर्मावघाती पक्षी के ही शरीर में आपना प्राण त्याग दूँगा। नहीं तो यह मेरे बाँधवों को छोड़ दे यह मेरी दृढप्रतिज्ञा है ॥६६॥ ऋषियों ने कहा-- उसके बाद ब्रह्महत्या के भय से कश्यप महर्षि ने गरुड से कहा कश्यप महर्षि ने कहा-- पक्षिश्रेष्ठ ! तुम ब्राह्मण के साथ इन सभी म्लेच्छों का वनों, पर्वतों तथा दिशाओं में वमन कर दो ऋषियों ने कहा-- उसके बाद पिता की आज्ञा से दोषों को जानकर गरुड ने वमन कर दिया । उसके बाद वे सब केश तथा दाढी मूछ से रहित हो गये । यवन भोजन प्रेमी हो गये तथा उनकी दाढी बहुत कम हो गयी ॥६७-६९॥ अग्नि में नंगे रहने वाले वे पापी दक्षिण दिशा में चले गये, वे नाम लेने योग्य भी नहीं हैं । वे भयङ्कर तथा प्राणियों का वध करने वाले तथा गौ को खाने वाले दुष्ट हैं ॥७०॥ कुत्सित
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know