Srishti Khanda Extracted Page 668
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-668
Sanskrit Original
क्षयमेष्यंति पापानि न चिरेण समंततः। पुण्यतीर्थप्रभावाच्च गोविंदस्य प्रभावतः ॥३९॥ क्षयमेष्यंति पापानि ब्रहत्वं प्राप्स्यते भवान् । श्रृणु तात यथावृत्तं कथयामः पुरातनम् ॥४०॥ आहारार्थी पुरा वत्स गरुडो विनतासुतः । पतंगोपि बहिः साक्षादंडान्निस्सृत्य शावकः ॥४९॥ क्षुघार्थी मातरं प्राह भक्ष्यं मे दीयतामिति । ततः पर्वतसंकाशं गरुडं च महाबलम् ॥४२॥ दृष्ट्वा माता महाभागा तनयं हृष्टमानसा । विनतोवाच क्षुधां ते बाधितुं पुत्र नशक्रोमि समंततः ॥४३॥तव तातस्तपस्तेपे लौहित्यस्योत्तरे तटे। कश्यपो नामधर्मात्मा साक्षाल्लोकपितामहः ॥४४॥ तत्र गच्छस्वपितरं पृच्छ कामं यथा तव। अस्योपदेशतस्तात क्षुधा ते शममेष्यति ॥४५॥ क्षय ऊचुः ततो मातुर्वचः श्रुत्वा वैनतेयो महाबलः । अगमत्पितुर भ्याशं समुहूर्तान्मनोजवः ॥४६॥ दृष्ट्वा तातं मुनिश्रेष्ठं ज्वलंतमिव पावकंम् । प्रणम्य शिरसा वाक्यमुवाच पितरं खगः ॥४७॥ वैनतेय उवाच भक्षार्थी समनुप्राप्तः सुतोऽहं ते महात्मनः । क्षुधया पीडितो नाथ भक्ष्यं मे दीयतां प्रभो ॥४८॥ ततो ध्यानं समालभ्य ज्ञात्वा तं विनतासुतम् । पुत्रस्नेहाद्नचश्चेद॑ प्रोवाच मुनिसत्तमः ॥४९॥ कश्यप उवाच अनेकशतसाहस्रा निषादाः सरितांपतेः। तीरे तिष्ठंति पापिष्ठास्तान्संभक्ष्य सुखीभव॥५०॥ तीर्थमुत्सादयंति स्म तीर्थकाका दुरासदाः । विना विप्रं निषादेषु भक्षय त्वमलक्षितम् ॥५९॥ का नाश करने के लिए दिव्य प्राजापत्य व्रतों का पालन करो । पवित्र तीर्थो में जाकर भगवान् गोविन्द की आराधना करो ॥३८॥ पुण्यतीर्थो के प्रभाव से तथा भगवान् गोविन्द की आराधना करने से तुम्हारे सारे पाप शीघ्र ही विनष्ट हो जायेंगे ॥३९॥ तुम्हारे सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे तथा तुम्हे ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हो जायेगी । इस विषय में एक पुराना कथानक है सुनो ॥४०॥ जब विनता के पुत्र गरुड़ अण्डे से बाहर निकले और बच्चे थे, वे आहार प्राप्त करने के लिए ॥४१॥ अपनी माता से कहे कि मुझे खाने को दो, उसके बाद पर्वत के समान विशालकाय महाबलवान्।४२॥ गरुड को देखकर महाभागा माता ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र से कहा । विनता ने कहा-- पुत्र मैं तुम्हारी भूख को नहीं मिटा सकती हूँ ॥४३॥ तुम्हारे पिता लौहित्य के उत्तर तट पर तपस्यारत उन धर्मात्मा का नाम कश्यप है । वे साक्षात् ब्रह्माजी के समान हैं ॥४४॥ अतएव तुम अपने पिता के पास चले जाओ और उनसे अपने भक्ष्य के विषय में पूछो । पुत्र उनके उपदेश से ही तुम्हारी भूख मिटेगी ॥४५।। ऋषियों ने कहा-- उसके बाद अपनी माता की बात को सुनकर मन के समान वेग वाले महाबलवान गरुड अपने पिता के पास आये ॥४६॥ अग्नि के समान अपनेपिता, उन मुनि को देखकर गरुड ने उनको शिर झुकाकर प्रणाम करके कहा ॥४७॥ वैनतेय ने कहा-- हे नाथ ! में आपका पुत्र हूँ, भोजन करना चाहता हूँ, आप मुझे भोजन दीजिये । मैं भूख से व्याकुल हूँ ॥४८॥ ऋषियों ने कहा-- उसके बाद ध्यान के द्वारा महर्षि ने उसे विनता का पुत्र जान लिया और पुत्र के स्नेह से मुनिश्रेष्ठ ने कहा कश्यप महर्षि ने कहा-- समुद्र के तट पर अनेक हजार पापी निषाद रहते हैं, उन सबों को खाकर सुखी हो जाओ॥४९-५०॥ ये दुष्ट तीर्थ काक हैं । ये तीर्थ को विनष्ट करने का काम करते हैं, उन सबों को तुम अप्रत्यक्ष हे
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