Srishti Khanda Extracted Page 667

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-667

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Sanskrit Original

श्रृणु पुत्र कथां रम्यां विचित्रां च पुरातनीम् । कस्यचिद्वाह्मणस्यापि यौवनाढ्यः सुतो5 भवत् ॥२५॥ ततो यौवनसंपत्ते मॉहाच्च पूर्वकर्मणः । चांडालीमगमत्सद्यस्तस्याः प्रियतरो भवत् ॥२६॥ तस्यामुत्पादितास्तेन पुत्रा दुहितरस्तथा । स्वकुटुंबं परित्यज्य गृहे तस्याश्चिरं स्थितः ॥२७॥ अन्या भक्ष्यं न चाश्चाति घृणया च सुरां त्यजेत् । तमुवाच सदा सा च भक्षयान्यतरां सुराम् ॥२८॥ तामुवाच तदाशौचं गदितुं नार्हसि प्रिये। उत्कारो जायते तस्याः श्रवणात्सततं मम ॥२९॥ एकदा समृगान्वेषात् श्रांतः सुप्तो गृहे दिवा । गृहीत्वा सा सुरां तस्य हसित्वा च मुखे ददौ ॥३०॥ ततो विप्रमुखादय्निः प्रजज्वालसमंततः। ज्वाला तु सकुटुबां तामदहच्च गृहं वसु ॥३१॥ हाहा कृत्वा समुत्थाय विललाप तदा द्विजः । विलापांते च जिज्ञासा समारब्धा च तेन हि॥३२॥ कुतश्चाम्निः समुद्भूतो गृहे दाहः कथं मम । ततः खेतमुवाचेदं तेजस्ते व्राह्मणस्य च॥३३॥ कथिते तद्यथावृत्ते ब्राह्मणो विस्मयं गतः । विमृश्यार्थमुवाचेदं पुनः खेऽस्य हितं वचः ॥३४॥ विप्रणष्टं सुतेजस्ते तस्माद्धर्मचरो भव। ततो मुनिवरान्गत्वा पप्रच्छात्महितं द्विजः॥३५॥ तमूचुर्मुनयः सर्वे दानधर्म समाचर। ऋषय ऊचुः पूयंते सर्वपापेभ्यो ब्राह्मणा नियमैर््रतैः ॥३६॥ नियमान् शास्त्दृष्टांश्च पूतत्वार्थमुपाचर । चांद्रायणांश्च कृच्छांश्च तप्तकृच्छान्पुनःपुनः ॥३७॥ प्राजापत्यांश्च दिव्यांश्च दोषशोषाय सत्वरम् । गच्छ तीर्थानि पूतानि गोविंदाराधनं कुरु ॥३८॥ जाता है और फिर ब्रह्मत्व को प्राप्त कर लेता है ॥२४॥ हे पुत्र ! एक विचित्र, मनोहर तथा प्राचीन कथा सुनो । किसी ब्राह्मण का पुत्र जवानी पर धनिक हो गया ॥२५॥ उसके बाद, जवानी, धन सम्पत्ति तथा पूर्वकर्म के प्रभाव से किसी चाण्डाली के साथ उसने सम्बन्ध स्थापित कर लिया और उसका अत्यन्त प्रिय हो गया ॥२६॥ उसने उस चाण्डाली के गर्भ से पुत्रों तथा पुत्रियों को उत्पन्न किया । वह अपने परिवार को छोड़कर उसी के घर रहने लगा।।२७।। वह किसी अभक्ष्य पदार्थ को नहीं खाता था और घृणा के कारण मदिरा को नहीं पीता था । वह चाण्डाली उसे अभक्ष्य वस्तुओं को खाने और मदिरा पीने के लिए कही तो ॥२८॥ उसने उस चाण्डाली से कहा कि तुम इन धृणित बातों को मत कहो, उसका नाम ही सुनकर मुझे उबकाई आने लगती हैं ॥२९॥ एक दिन वह मृग का अन्वेषण करने के कारण दिन में ही अपने घर में सो गया । वह चाण्डाली मदिरा लेकर हँसती हुए उसके मुख में मदिरा डाला ही ॥३०॥ उससे उस ब्राह्मण के मुख से निकलकर चारो ओर अग्नि जलने लगी । उस ज्वाला ने कुटुम्ब सहित उस चाण्डाली तथा घर की सारी सम्पत्ति को जला दिया ॥३१॥ वह उठकर हाय-हाय करता हुआ ब्राह्मण विलाप करने लगा । विलाप के बाद उसे इस बात को जानने की इच्छा हुई कि ॥३२॥ कहाँ से अग्नि उत्पन्न हुयी तथा कैसे मेरा घर जल गया ? उस समय आकाश बाणी हुयी कि तुम्हारे ब्राह्मतेज की (यह अग्नि थी) ॥३३॥ ठीक-ठीक घटना कहने पर उस ब्राह्मण को आश्चर्य हुअ । अर्थ का विस्तार करके आकाशवाणी ने पुन: कहा ॥३४॥ तुम्हारा तेज विनष्ट हो गया है, अतएव धर्म का आचारण करो । उसके बाद श्रेष्ठ मुनियों के पास जाकर उसने अपने कल्याण के विषय में पूछा ॥३५॥ उसको मुनियों ने कहा कि तुम दान धर्म करो । ऋषियों ने कहा-- नियमों और ब्रतों का पालन करके ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं ॥३६॥ अतएव पवित्र होने के लिए शास्रं में बतलाये गये नियमों का पालन करो । तुम बार-बार तप्त एवं कृच्छू चान्द्रायण व्रतों को करो ।।३७॥। शीघ्र ही पापों

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