Srishti Khanda Extracted Page 666
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-666
Sanskrit Original
यज्ञार्थका देवलका नाक्षत्रा ग्रामयाजकाः । परदाररता नित्यं पंचैते ब्राह्मणाधमाः ॥९२॥ मंत्रसंस्कारहीनाश्च शुचिसंयमवर्जिताः । मोघाशिनो दुरात्मानो ब्राह्मणाश्चाधमाधमाः ॥९३॥ अपि स्तेयरता मूढाः सर्वधर्मविवर्जिताः । उन्मार्गगामिनो नित्यं ब्राह्मणाश्चाधमाधमाः ॥९४॥ श्राद्धादिकर्मरहिता गुरुसेवाविवर्जिताः । अमंत्रा भिन्नमर्यादा एते सर्वाधमाधमाः ॥९५॥ असंभाष्या इमे दुष्टास्सर्वे निरयगामिनः। अमेध्यास्ते दुराचारा अपुज्याश्च समंततः॥९६॥ खड्गोपजीविकाः प्रेष्या गोवाहनरता द्विजाः। कारुव्रृत्युपजीवाश्च गणवार्द्धषिकाश्च ये॥९७॥ बालापण्याभिचाराश्च अंत्यजाश्रयमाश्रिताः । कृतध्नाश्च गुरुध्नाश्च एते सर्वाधमाः स्मृताः ॥१८॥ ये चैवान्ये हताचारा पाषंडा धर्मनिंदकाः । दूषका देवभेदानामेते ब्रह्मद्विषो द्विजाः॥९९॥ तथापि ब्राह्मणश्चैव न हंतव्यः कदाचन । एनं हत्वाद्विजश्रेष्ठ ब्रह्महा पुरुषो भवेत् ॥२०॥ अंत्यजातिषु म्लेच्छेषु तथा चांडालजातिषु । पतितो वान्नयोनिभ्यां न हंतव्यः कथंचन ॥२९॥ सर्वजातिस्न्रियं गत्वा सर्वाभक्ष्यस्य भक्षणात् । द्विजत्वं नविनश्येत पुण्याद्विप्रो भवेत् पुनः ॥२२॥ नारद उवाच ईदृशं दुष्कृतं कृत्वा पश्चात्पुण्यं समाचरेत् । कां गतिं यात्यसौ विप्रः सर्वलोकपितामह॥२३॥ ब्रह्मोवाच कृत्वा सर्वाणि पापानि पश्चाद्यस्तु जितेद्रियः । मुच्यते सर्वपापेभ्यः पुनर्ब्रह्मत्वमर्हति ॥२४॥ सन्ध्या नहीं करने वाला विप्रघाती होता है ॥१०॥ मन्त्र एवं ब्रत से रहित वेद विद्या में निपुण भी व्यक्ति, यज्ञ, दान इत्यादि नहीं करने वाला ब्राह्मण अधमाधम है ॥११॥ याज्ञों से धन कमाने वाले, देवताओं की पूजा कराकर धन कमाने वाले, नक्षत्रादि बतलाकर धन कमाने वाले, गावों में जा-जाकर यज्ञ कराने वाले, तथा दूसरों की स्त्रियो में रत रहने वाला ये पाँच प्रकार के ब्राह्मण अधम हैं ॥१२॥ मन्त्र के संस्कार से रहित, पावित्र्य तथा संयम से रहित, व्यर्थ ही भोजन करने वाले दुष्ट ब्राह्मण अधमाधम हैं ॥१३॥ चोरी करने वाले, अज्ञानी, किसी धर्म का पालन नहीं करने वाले तथा नित्य ही कुमार्गगामी ब्राह्मण अधमाधम हैं ॥१४॥ श्राद्ध आदि कमों को नहीं करने वाले, गुरुजनों की सेवा नहीं करने वाले, मंत्र ज्ञान से रहित, मर्यादा का भङ्ग करने वाले, ये सभी ब्राह्मण अधमाधम हैं । इन दुष्ट ब्राह्मणों से बात भी नहीं करना चाहिए, ये सभी नरकगामी हैं, वे अमेध्य अपूज्य तथा दुराचारी हें ।।१६॥। जो ब्राह्मण खड्गोपजीवी (हिंसा के बल पर जीने वाले) हैं, नौकर, बैलों की सवारी करने वाले, बढईगीरी करने वाले, अथवा गणवार्द्धषिक हैं ॥१७॥ लड़की को बेंचने वाले, दुराचारी और शूद्रो के अधीन रहने वाले, कृतध्न, गुरु की हत्या करने वाले, ये सबके सब ब्राह्मण अधम हैं ॥१८॥ दूसरे के आचार को विनष्ट करने वाले है, पाषण्डी, धर्म की निन्दा करने वाले, भिन्न-भिन्न देवताओं में दोष लगाने वाले ये सभी ब्राह्मण ब्रह्मद्रेषी हें ॥१९॥ फिर भी ब्राह्मण का वध कभी भी नहीं करना चाहिए । हे द्विजश्रेष्ठ ! ब्राह्मण को मारने वाला पुरुष ब्रह्मघाती होता है ॥२०॥ यदि कोई ब्राह्मण शुद्रों में, म्लेच्छों में तथा चाण्डाल गति वालों में भोजन तथा योनि सम्बन्ध के द्वारा मिल जाय, तो भी उसका वध नहीं करना चाहिए ॥|२१॥ सभी जाति के स्त्रियों के साथ सहगमन करके सर्वभक्षी हो जाने पर भी ब्राह्मणत्व का नाश नहीं होता है । वह ब्राह्मण पुण्य कर्म करके पुनः विप्र हो सकता है ॥२२॥ नारदजी ने कहा-- इसतरह का पाप कर्म करके बाद में पुण्यकर्म करके वह सम्पूर्ण लोकों के हे पितामह ! वह किस-किस गति को प्राप्त करता है ?॥२३॥ ब्रह्माजीने कहा-- सभी पापों को करके जो बाद में जितेन्द्रिय हो जाता है, वह सभी पापों से मुक्त हो
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