Srishti Khanda Extracted Page 665
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-665
Sanskrit Original
Re श्रीपद्यमहापुराण सैतालिसवाँ अध्याय नारद उवाच तव प्रसादतो ज्ञातो विप्रः पुण्यतमश्च यः। यथाजानामि देवेश क्रियया ब्राह्मणाधमम् ॥१॥ ब्रूहि शीघ्रं सुरश्रेष्ठ यदि प्रीतिं मयीच्छसि । ब्रह्मोवाच स्नानैर्दशविधैर्मुक्तस्तथैव तर्पणादिभिः ॥२॥ संध्यासंयमहीनश्च स एव ब्राह्मणाधम: । देवपूजाव्रतैर्मुक्तो वेदविद्यादिभिस्तथा ॥३॥ सत्यशौचादिभिश्चैव योगज्ञानाग्नितर्पणैः । पंचस्नानानि विप्राणां कीर्तितानि महर्षिभिः ॥४॥ आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं वायव्यं दिव्यमेव च । आग्नेयं भस्मना स्नानमद्धिर्वारुणमुच्यते ॥५॥ आपोहिष्ठेति वै ब्राह्मं वायव्यं गोरजः स्मृतम् । अद्धिरातपवर्षाभिर्दिव्यं स्नानमुदाहृतम् ॥६॥ एतैस्तु मंत्रतः स्नानात्तीर्थानां फलमाप्नुयात् । तुलसीपत्रसंलग्नं सालग्रामशिलांबु च ॥७॥ गवां शृंगोदकं चैव विप्रपादोदकं च यत् । गुरूणामेवमुख्यनां पूतात्पूतमिति स्मृतिः ॥८॥ त्यागतीर्थादिभिर्यज्ञै ् रतहोमादिभिस्तथा । यत्फलं लभते धीरः स्तानैरेतैस्तु तत्फलम् ॥९॥ तर्पणैश्च विनिर्मुक्तः पितृणामेव नित्यशः । पितृहा नरकं याति संध्याहीनस्तु विप्रहा ॥१०॥ मंत्रब्रतविहीनश्च वेदविद्यागुणैरपि । यज्ञदानादिभिर्मुक्तो ब्राह्मणश्चाधमाधमः ॥९९॥ पञ्चविध स्नान वर्णन, ब्राह्मण पुत्र की कथा का वर्णन, गरुड की कथा, कश्यप गरूड संवाद, इन्द्र द्वारा कहु पुत्र सर्पो के सन्निकट से अमृत का हरण नारदजी ने कहा-- आपकी कृपा से मैंने पुण्यतम ब्राह्मण को जान लिया है, अब आप मुझको अधम ब्राह्मण द्वारा किए जाने वाले कार्यों को बतलाइये ॥१॥ हे सुरश्रेष्ठ ! यदि आप का मेरे ऊपर स्नेह है तो उसे आप मुझे शीघ्र बतलाइये । ब्रह्माजी ने कहा-- जो दश प्रकार के स्नान बतलाये गये हैं, उन सबों को नहीं करने वाला, संध्या एवं तर्पण आदि क्रियाओं को नहीं करने वाला ॥२॥ तथा जो संध्या एवं संयम से रहित है, वही अधम ब्राह्मण है । देवताओं की पूजा तथा ब्रतों को नहीं करने वाला तथा वेददि विद्याओं से रहित ॥३॥ सत्य एवं शौचादि का पालन नहीं करने वाला जो योग ज्ञान से रहित है वह तथा जो अग्निहोत्र एवं तर्पण रहित है, वह अधम ब्राह्मण है। महर्षियों ने विप्रो के लिए पाँच स्नानों की विधि बतलायी है ॥४॥ आग्नेय स्नान, वारुण स्नान, ब्राह्म स्नान, वायव्य स्नान तथा दिव्य स्नान । भस्म के द्वारा किया जाने वाला स्नान आग्नेय स्नान है । जल से किया जाने वाला स्नान वारुण स्नान है ॥५॥ आपोहिष्ठा: इत्यादि मन्त्रों से किया जाने वाला स्नान ब्राह्म स्नान है । गोरज (गाय के खुरों की धूलि) से किया जाने वाला स्नान वायव्य स्नान है और धूप के निकले रहने पर भी होने वाली वर्षा के जल से किया जाने वाला स्नान दिव्य स्नान है ॥६॥ मन्त्र पूर्वक इन सबों से किये जाने वाले स्नान से तीर्थो का फल प्राप्त होता है । तुलसी पत्र से युक्त शालग्राम शिला के जल, गायों के शृङ्ग का जल, ब्राह्मणों के चरणोदक का जल तथा मुख्य गुरुओं के चरणोदक सर्वपिक्षया पवित्र होते हैं । ऐसा स्मृतियाँ बतलाती हैं ॥७-८॥ त्याग, तीर्थ तथा बज्ञो के द्वारा त्रतों एवं होमों के द्वारा जिस फल की प्राप्ति होती है, उसी फल की प्राप्ति इन स्नानों से होती है ॥९॥ जो प्रतिदिन पितृतर्पण नहीं करता है, वह नित्य ही पितृवध के दोष का भागी होता है । पितृहा पुरुष नरक में जाता है, और
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