Srishti Khanda Extracted Page 664

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-664

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

तस्य पापं क्षयं याति जन्मकोटिसमुद्धवम्। गायत्र्युच्चारमात्रेण पापकूटात्पुनाति च ॥१९७॥ स्वर्गापवर्गमाप्रोति जप्त्वा नित्यं द्विजोत्तमः । वासुदेवस्य मंत्राणि जपेद्यस्तु दिने दिने ॥१९८॥ प्रणमेच्च हरेः पादौ सगच्छेदपवर्गिताम् । वासुदेवस्य स्तोत्राणि मुखे वापि कथोत्तमा॥९९९॥ पंकस्य लवमात्रं तु तस्य देहे न तिष्ठति । वेदशास्त्रावगाहेन त्रिस्रोतः स्नानजं फलम् ॥२००॥ धर्मपाठकृतां लोके यज्ञकोटिफलं लभेत्। एवंविप्रगुणान् वक्तुं न शक्रोमि द्विजोत्तम ॥२०९॥ विश्वरूपश्च को देही समूर्तो हरिरेव च। यस्य शापाद्विनाशः स्यादायुर्विद्यायशोधनम् ॥२०२॥ वरदानात्समायांति सर्वाः संपत्तयस्तथा । विष्णुर्ब्रह्मण्यतामेति सदाविप्रप्रसादतः ॥२०३॥ नमोब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्द्रिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः ॥२०४॥ मंत्रेणैवं हरिं यस्तु पूजयेत्सततं नरः । प्रसादी च हरिस्तस्य विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् ॥२०५॥ य इदं शृणुयात्पुण्यमाख्यानं धर्मविग्रहम्। तस्य पापं क्षयं याति जन्मजन्मकृतं च यत्॥२०६॥ यः पठेत्पाठयेद्वापि उपदेष्टा जनस्य च । न तस्य पुनरावृत्तिः स्वर्गमक्षयमश्नुते॥२०७॥ धनं धान्यं लभेदत्र राज्यभोगानरोगिताम्। सत्सुतं च शुभां कीर्ति देववद्रमते दिवि॥२०८॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे ब्राह्मणसंस्कारो नाम षट्चत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४६॥ ke करोड़ों जन्मों के पाप विनष्ट हो जाते हैं । ब्राह्मण केवल गायत्री का नाम लेकर ही पवित्र हो जाता है ॥१९७॥ प्रतिदिन गायत्री का जप करने वाला मनुष्य स्वर्ग एवं मोक्ष को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति भगवान् वासुदेव के मन्रो का प्रतिदिन जप करता हे ॥१९८॥ तथा श्रीभगवान् के चरणों में प्रणाम करता है, वह मुक्त हो जाता है । वासुदेव के स्तोत्रों का पाठ करना ही उत्तम है ॥१९९॥ उसके शरीर में पाप का लव भी नहीं रह जाता है । वेदों और शास्त्रा का चिन्तन करने से त्रिपथ गामिनी गंगा में स्नान करने का फल होता है ॥२००॥ संसार में धर्म ग्रन्थों का पाठ करने से करोडों यज्ञों का फल प्राप्त होता है । इसतरह से द्विजोत्तम नारद, मैं ब्राह्मणों के गुणों का वर्णन स्वयं नहीं कर सकता हूँ ॥२०१॥ विश्वरूप कोई शरीर नहीं है, वह ब्राह्मण ही मूर्तिमान श्रीहरि है । उसके शाप से आयु, विद्या, यश एवं धन का विनाश हो जाता है ॥२०२॥ ब्राह्मण के वरदान से सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं । भगवान् विष्णु भी ब्राह्मणों की कृपा से सदा ब्रह्मण्य (ब्राह्मण भक्त) बने रहते हैं ॥२०३॥ ब्रह्मण्य देव श्रीभगवान् को नमस्कार है, गौ और ब्राह्मणों का कल्याण करने वाले भगवान् को नमस्कार है, जगत् का कल्याण करने वाले श्रीभगवान् को नमस्कार है, भगवान् कृष्ण को नमस्कार है, भगवान् गोविन्द को बार-बार नमस्कार है ॥२०४॥ इस मन्त्र के द्वारा जो व्यक्ति निरन्तर श्रीभगवान् की पूजा करता है उसके ऊपर भगवान् कृपा करते हें और वह भगवान् विष्णु के लोक में जाता है ॥२०५॥ जो व्यक्ति इस धार्मिक आख्यान का श्रवण करता है, उसके अनेक जन्मों में किए गये पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥२०६॥ जो व्यक्ति इसका पाठ करता है, अथवा किसी को पढाता है, अथवा इसका लोगों को उपदेश करता है, वह पुन: इस संसार में नहीं आता है । उसको अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है।॥२०७॥। वह इस संसार में धन, धान्य तथा आरोग्य को प्राप्त करता है । वह सत्पुत्र, सत्कीर्ति को प्राप्त करके अन्त में स्वर्ग में देवता के समान रमण करता है ॥२०८॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के ब्राह्मणों के संस्कार वर्णन नामक छियालीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४६।। rie

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know