Srishti Khanda Extracted Page 663
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-663
Sanskrit Original
RR श्रीपद्ममहापुराण ओततत्सवितुर्वरेणियं भगोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥९८५॥ अथ गायत्री पंचशीर्षलक्षणम् । ३% भूः ३७ भुवः ३ॐ स्वः ३५ महः ॐ जनः ३% तपः ३ सत्यम् ॥ ३ तत्सवितुर्वरेण्यं भगों देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥९८६॥ सव्याहतिं तु गायत्रीं पुनर्न्यासं तु कारयेत्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् ॥१८७॥ ॐ भूः पादाभ्याम् ३५ भुवः जानुभ्याम् ३७ स्वः कट्याम् ३७ महः नाभौ ॐ जनः हृदये न्यसेत् । ॐ तपः करयोः ३ॐ सत्यं ललाटे ३ॐ तत्सवितुर्वरेणियं भर्गेदिवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् । इति शिखायाम् ॥१८८॥ एवं विप्रो न जानाति स एव ब्राह्मणाधम: । न तस्य क्षीयते पाप्मा भवेद्ूरिप्रतिग्रहः ॥९८९॥ इमां यो वेत्ति गायत्रीं सर्वबीजसमन्विताम्। स वेत्ति चतुरो वेदान् योगज्ञानं जपत्रयम् ॥१९०॥ य एनां नैव जानाति सशूट्रात्परतः स्मृतः । तस्यापूतस्य विप्रस्य न देयं पितृपार्वणम् ॥१९१॥ नस्नानफलदः कश्चित्सर्वं निष्फलं भवेत्। विद्या वित्तं तथा जन्म द्विजत्वं कारणं यतः॥९९२॥ निष्फलं सकलं तस्य मेध्यं पुष्पं यथाऽशुचौ । चतुर्वेदाश्च गायत्रीं पुरा वै तुलिता मया ॥१९३॥ चतुर्वेदात्परा गुवीं गायत्री मोक्षदा स्मृता । दशभिर्जन्मजनितं शतेन च पुरा कृतम्॥१९४॥ त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हंति किल्विषम् । गायत्रीमक्षमालायां सायं प्राप्तश्च यो जपेत् ॥१९५॥ चतुर्णामपि वेदानां फलं प्राप्रोत्यसंशयम् । त्रिसंध्यं यो जपेन्नित्यं गायत्रीं हायनं द्विजः ॥१९६॥ जिसको जानकर व्राह्मण पर्रहम को प्राप्त कर लेता है ॥१८४॥ ३% तत्संवितुर्विण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात् ॥१८५।। 3३% भू, ३ भुवः, ३ स्वः, ३५ महः, 3७ जनः, ३ तपः, 3७ सत्यम्, ३ॐ तत्सवितुवरिण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात् ॥१८६॥ फिर व्याहति सहित गायत्री का न्यास करना चाहिए । ऐसा करने वाला ब्राह्मण सभी पापों से रहित होकर भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त कर लेता है।। १८ ७॥ इसके बाद फिर न्यास करे ३ भू: इससे चरणों में न्यास करें, ३% भुवः से दोनों घुटनों में न्यास करे, ३ स्व: से कमर में न्यास करे, ३% मह: से नाभि में न्यास करे, ३ जन: से हृदय में न्यास करे, ३% तपः से दोनों हाथों में न्यास करे, ३% सत्यम् से ललाट में न्यास करे, और ३% तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात् से शिखा में न्यास करे ॥१८८॥ इन सारी बातों को जो नहीं जानता है, वही अधम ब्राह्म है । उसका पाप विनष्ट नहीं होता है, अपितु दान लेने से उसका पाप बढता ही है ॥१८९॥ जो सभी जीवों से युक्त इस गायत्री को जानता है । वह चारों वेदों का ज्ञाता, योग का ज्ञाता तथा तीनों जपों का ज्ञाता हो जाता है ॥१९०॥ जो इस गायत्री को नहीं जानता है, वह शूद्र से भी बढकर है । उस अपवित्र ब्राह्मण को पितृ पार्वण श्राद्ध आदि में भोजन नहीं कराना चाहिए ॥१९१॥ उसको स्नान करने का कोई फल नहीं होता है उसका सब कुछ किया हुआ निष्फल होता है; क्योंकि विद्या, वित्त, ब्राह्मणवंश में जन्म, द्विजत्व का कारण यह गायत्री का ज्ञान हीं है ॥१९२॥ उसका सबकुछ उसीतरह से निष्फल होता है जिसतरह अपवित्रावस्था में पवित्र पुष्प इत्यादि भी व्यर्थ हो जाते हैं । पूर्वकाल में मैंने चारो वेदों तथा गायत्री दोनों को तौला था ।।१९३।! तो चारो वेदों से मोक्षप्रदा गायत्री गुवीं निकली। पहले के एक हजार जन्मों में किए गये पाप कर्मो को छह हजार गायत्री का जप विनष्ट कर देता हे । जो व्यक्ति सायंकाल और प्रात:काल रुद्राक्ष की माला पर गायत्री का जप करता है, वह निस्संदेह चारो वेदों के पाठ करने का फल प्राप्त करता है । जो ब्राह्मण एक वर्ष तक तीनो सन्ध्याओं में गायत्री का जप करता है ॥१९४-१९६॥।। उसके
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