Srishti Khanda Extracted Page 662
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-662
Sanskrit Original
रेकारं गुह्देशे तु णिकारं वृषणे न्यसेत्। यंकारं कटिदेशे तु भकारं नाभिमण्डले ॥१७४॥ गोकारं जठरे न्यस्य देकारं स्तनयोर्न्यसेत्। वकारं हृदयेन्यस्थ स्यकारं करदेशतः ॥१७५॥ धीकारं वदनेन्यस्य मकारं तालुके न्यसेत्। हिकारं नासिकाग्रे च धिकारं चक्षुषोर्न्यसेत्॥९७६॥ योकारं तु भ्रुवोमध्ये योकारं च ललाटके । नः कारं तु मुखे पूर्वे प्रकारंदक्षिणेमुखः ॥१७७॥ चोकारं पश्चिमेन्यस्य दकारंचोत्तरेन्यसेत्। यात्कारं मूर्ध्निविन्यस्य सर्वव्यापीव्यवस्थितः ॥९७८॥ एतान्विन्यस्य धर्मात्मा ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः। महायोगी महाज्ञानी परं निवाणकं व्रजेत् ॥९७९॥ संध्याकाले पुनर्न्यासं शृणु त्वं तद्यथार्थतः। ॐ भूरितिहृदये न्यस्य ॐभुवश्शिरसि ऱ्यसेत् ॥१८ ०॥ ॐस्वःशिखायै तत्सवितुर्वरेण्यमिति कलेबरे । ३० भगोदिवस्यधीमहीतिनेत्रयोः ॥१८ १॥ ॐधियो यो नः प्रचोदयादितिकरयोर्न्यसेत्। ओं आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् | इत्युदकस्पर्शमात्रेणपापात्यूतोव्रजेद्धरिम् ॥९८२॥ ॐ भूः ॐ०भुवः ३स्वः ३०महः ३७ जनः ३ तपः ३% सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ॐ आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् इति सव्याहतिं सप्रणवां द्वादशोंकारां संध्याकाले कुंभकेन वारत्रयं जप्त्वा ॥ सूर्योपस्थाने सावित्रीं चतुर्विशत्यक्षरां जप्त्वा । महाविद्याधिको भवति ब्रह्मत्वं लभते॥१८३॥ षट्कुक्षिलक्षणां पुत्र गायत्रीं शृणु यत्नतः। यां ज्ञात्वा तु परंब्रह्मस्थानं गच्छति वै द्विजः॥१८४॥ घुटनों में करे, 'व' का न्यास ऊरू प्रदेश में करे । 'रे' का न्यास गुप्ताङ्ग में करे, 'णी' का न्यास वृषण (अण्डकोश) में करे ॥१७३-१७४॥ 'यम्' का न्यास कटि प्रदेश में करे, 'भ' का न्यास नाभि में करे । 'गो' का न्यास पेट में करे और 'दे' का न्यास दोनों स्तनों में करे । “व” का न्यास हृदय में करे । 'स्य' का न्यास हाथ में करे ॥१७५॥ 'धी' का न्यास मुख में करके 'म' का न्यास तालु में करे । 'हि' का न्यास नासिका में करके 'धि' का न्यास दोनों नेत्रो में करे ॥१७६॥ यो का न्यास दोनों भैहों के मध्य में करके, 'यो' का न्यास ललाट में करे । “नः” का न्यास पूर्वमुख में करके 'प्र' का न्यास तालु में करे ॥१७७॥ 'चो' का न्यास मुख के पश्चिम में करके 'द' का न्यास मुख के उत्तर में करे । 'यात का न्यास मूर्धा प्रदेश में करके वह सर्व व्यापक रूप से व्यवस्थित हो जाता है ॥१७८॥ इन न्यासों को करके ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव स्वरूप धर्मात्मा महायोगी और महाज्ञानी हो जाय और परं निर्वाण को प्राप्त कर ले ॥१७९॥ फिर संध्याकाल में किए जाने वाले न्यास को तुम सुनो । ३% भू का हृदय में न्यास करे । 3» भुवः? का शिर में न्यास करें, ३% स्वः' का शिखा में करे । ३७ 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' का शरीर में न्यास करे । ३% “मगेदिवस्य धीमहि” का दोनों नेत्रो में न्यास करे । “३% धियो यो नः प्रचोदयात्' का दोनों हाथों में न्यास करे । “३% आपो ज्योतीरसोमृतं बरह्म भूर्भुवः स्वरोम्’ इसके द्वारा जल का स्पर्श करे । ऐसा करने वाला पाप से पवित्र होकर श्रीहरि को प्राप्त करता है ।॥१८०-१८१॥ उसके बाद ३ॐ भूः, ३% भुवः, ३% स्वः, ॐ महः, ॐ जनः, 3& तप:, ३ सत्यम्, ॐ तत्सवितुरवरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ आपो ज्योती रसो मृतं ब्रह्म, भूभुर्वः स्वरोम् । इसतरह से प्रणव तथा व्याहति युक्त द्वादश ओंकारों वाली गायत्री का सायं काल कुम्भक के द्वारा तीन बार जप करे, सूर्योपस्थान में चौबीस अक्षरों वाली सावित्री का जप करक ब्राह्मण, महाविद्या से सम्पन्न हो जाता है । ब्रह्मत्व को प्राप्त कर लेता है ॥१८२-१८३॥ हे पुत्र ! सावधानी से षट्कुक्षि लक्षण गायत्री को सुनो ।
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