Srishti Khanda Extracted Page 661
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-661
Sanskrit Original
तस्माहुदं समाकुंच्य प्राणेन सह योजयेत् । पूरकेण तदा पुत्र कृत्वा कुंभकमुत्तमम् ॥१५९॥ प्राणायामत्रयं कृत्वा गायत्रीं संजपेदिद्ठजः । अनेनैवजपेद्यस्तु महापातकसंचयः ॥१६०॥ सकृदुच्चारितेनैव क्षयं यात्युपपातकम् । प्रतिवर्णस्वरं ज्ञात्वा विन्यस्येद्यः कलेवरे ॥१६१॥ सजनोब्र्मतामेति फलं वक्तुं न शक्रुमः। प्रत्यक्षरस्य यद्दैवं श्रणु पुत्र वदाम्यहम् ॥१६२॥ यज्जप्त्वा च पुनर्मातुस्तनं न पिबति द्विजः । आग्नेयं प्रथमं ज्ञेयं वायव्यं तु द्वितीयकम् ॥१६३॥ तृतीयं सूर्यदैवत्यं चतुर्थ वैयुतं तथा। पंचमं यमदैवत्यं वारुणं षष्ठमुच्यते॥१६४॥ सप्तमं बार्हस्पत्यं तु पार्जन्यं चाष्टमं विदुः । ऐन्दंच नवमं ज्ञेयं गांधर्वं दशमं तथा ॥१६५॥ पौष्णमेकादशं विद्धि मैत्रं द्वादशकं स्मृतम् । त्वाष्ट्रं त्रयोदशं ज्ञेयं वासवं तु चतुर्दशम् ॥१६६॥ मारुतं पंचदशकं सौम्यं षोडशकं स्मृतम् । आंगिरसं सप्तदशं वैश्वदेवमतः परम् ॥१६७॥ आश्विनं चैकोनविंशं प्राजापत्यं तु विंशकम् । सर्वदेवमयं ज्ञेय मेकविंशकमक्षरम् ॥१६८॥ रौद्रं द्वाविंशकं ज्ञेयं ब्राह्यंज्ञेयमतः परम् । वैष्णवं तु चतुर्विशमेता अक्षरदेवताः ॥१६९॥ जपकाले तु संचिंत्य तासु सायुज्यतां ब्रजेत्। ज्ञात्वा तु देवतास्तस्य वाङ्मयं विदितं भवेत्॥१७०॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मणः पदवीं ब्रजेत् । गायत्रीं विन्यसेत्पूर्वं शरीरे चात्मनो बुधः ॥१७९॥ चतुर्विशति स्थानेषु आपादमस्तकेषु च। तत्कारं विन्यसेद्योगी पदांगुष्ठे विचक्षणः ॥१७२॥ सकारं गुल्फदेशे तु विकारं जंघयोर्न्यसेत् तुकारं जानुमध्ये च वकारं चोरुदेशतः ॥९७३॥ इसलिए गुदा प्रदेश को संकुचित करके अपान वायु को प्राण वायु के साथ मिलाये । उसके बाद हे पुत्र ! पूरक के द्वारा उत्तम कुम्भक करके ॥१५९॥ तथा तीन प्राणायाम करके गायत्री का जप करे महापापी पुरुष भी इस क्रम से गायत्री का जप करे तो ॥१६०॥ एक बार गायत्री जपने से ही उसंके सारे उपपातक नष्ट हो जाते हैं ।जो प्रत्येक वर्ण के स्वर को जानकर उसका अपने शरीर में न्यास करता है ॥१६१॥ वह मनुष्य ब्रह्मत्व को प्राप्त कर लेता है। उसके फल का वर्णन मैं नहीं कर सकता हूँ । हे पुत्र ! गायत्री के प्रत्येक अक्षर के जो देवता हैं, उनका वर्णन में करता हूँ, उसे तुम सुनो ॥१६२॥ उसका जप करके ब्राह्मण पुन: जन्म नहीं लेता है । गायत्री के प्रथम अक्षर का देवता अग्नि है, द्वितीय अक्षर 'स' का देवता वायु है ॥१६३॥ तृतीय 'वि' के देवता सूर्य हैं, चतुर्थ 'तु' का देवता विद्युत् है, पाँचवें 'व' का देवता यम है, छठे अक्षर रे' के देवता वरुण है, सातवें “णी' के देवता बृहस्पति हैं आठवें 'यं' के देवता पर्जन्य हैं, नवें 'भ' के देवता इन्द्र हैं, दशवें 'गो' के देवता गन्धर्व हैं, ग्यारहवें 'दे' के देवता पूषा है, बारहवें 'व' के देवता मित्र हैं, तेरहवें 'स्य' के देवता त्वष्टा है, चौदहवें “धी' के देवता वसु हैं, पन्द्रहवें 'म' के देवता मरुत् हैं और सोलहवें 'हि' के देवता सोम हैं ॥१६५-१६७॥ सत्रहवें 'धि” के देवता अङ्गिरा हैं, अठारहवें 'यो' के देवता विश्वेदेव हैं, उन्नीसवें यो” के देवता अश्विनीकुमार हें, बीसवें “नः” के देवता प्रजापति हैं, इक्कीसवें “प्र” के देवता सभी देवता है, बाइसवें 'चो' के देवता रुद्र हैं, तेइसवें “द' के देवता ब्रह्मा हैं, और चौबीसवें 'यात्' के देवता विष्णु हैं । ये सभी अक्षर देवता है । जप के समय इन सबों का चिन्तन करके मनुष्य इन देवताओं के सायुज्य को प्राप्त करता है ॥१६८-१७०॥ अक्षरों के देवताओं को जानकर वाङ्मय का ज्ञान हो जाता है । वह ब्राह्मण सभी पापों से रहित होकर ब्रह्माजी की पदवी को प्राप्त कर लेता है ॥१७१॥ विद्वान् को चाहिए कि वह सर्वप्रथम अपने शरीर में गायत्री का न्यास पैर से लेकर मस्तक तक चौबीस स्थानों में करे ॥१७२॥ निपुण योगी 'तत्' का न्यास पैर के अंगूठे में करे, 'स' का न्यास गुल्फ प्रदेश में करे 'वि' का न्यास जंघाओं में 'तु' का न्यास
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