Srishti Khanda Extracted Page 660
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-660
Sanskrit Original
साक्षाद्ब्रहमयो विप्रः पूजनीय: प्रयत्नतः । दानं दद्याच्च विधिवत् सदा पर्वणि पर्वणि ॥१४७॥ अक्षयं लभते दाता जन्मकोटिशतान्प्रति । स्वाध्यायनिरतो विप्रो यः पठेत्पाठयेत्परान् ॥९४८॥ धर्म च श्रावयेल्लोके सदाचारं श्रुतिं स्मृतिम् । पुराणसंहितां नूनं तथैव धर्मसंहिताम् ॥१४९॥ श्रावयित्वा तु लोकेषु श्रावयित्वा द्विजातिषु । उर्व्या विष्णुसमः सोपि पूजनीयो नरैः सुरैः ॥१५०॥ यदलं चाक्षयं तस्य तीर्थभूतानघस्य च । समानमर्चनं कृत्वा नरो यात्यच्युतालयम् ॥१५१॥ कदाचित् क्रियते पापं विप्रः पापैर्नलिप्यते। चांडालस्य गृहे निष्ठौ भास्करज्वलनौ यथा ॥१५२॥ याजनाध्यापनाद्यौनात्तथैवासत््रतिग्रहात् । विप्राणां न भवेद्दोषो ज्वलनार्कसमा द्विजाः ॥१५३॥ ताग्रतिग्रहजान् दोषान् प्राणायामव्यवस्थिताः । नाशयंतीह पापानि वायुर्मेधमिवांबरे ॥१५४॥ गायत्रीं यो जपेन्नित्यं प्राणायामसमन्विताम् । प्रत्यक्षरामरैयुक्तां स्वाङ्गेविन्यस्यतामपि ॥१५५॥ सर्वपापाद्दिनिर्मुक्तो जन्मकोटिकृतादपि। ब्रह्मणः पदवीं प्राप्य सगच्छेत्प्रकृतैः परम् ॥१५६॥ प्राणायामयुतां तस्माद्रायत्रीं जप नारद। नारद उवाच प्राणायामाः कथं ब्रह्मग्रत्येकाक्षरदेवता: ॥१५७॥ तेषां न्यासं तथांगेषु वद तात यथाक्रमम्। ब्रह्मोवाच गुददेशे त्वपानःस्याद्धूदि प्राणोस्ति देहिनः ॥१५८॥ भी मन्त्र वैसा ही है । जिस किसी भी वंश में उत्पन्न व्यक्ति इनमें से किसी के भी मन्त्र का जप करके उस देवता के गुणों से युक्त हो जाता है ॥१४५-१४६॥ विप्र साक्षात् बरह्म स्वरूप होता है, उसकी पूजा अवश्य करे और प्रत्येक वर्ष (संक्रान्तियों) पर विधि पूर्वक उसको दान दे ॥१४७।। ऐसे दाता सैकड़ों करोड़ो जन्मों तक अक्षय पुण्य को प्राप्त करता है । वेदाध्ययन करने वाला विप्र जो स्वयं वेदों को पढता है या दूसरों को पढाता है ॥१४८॥ लोगों को धर्म, सदाचार, श्रुतियों तथा स्मृतियों का उपदेश देता है, पुराण संहिता तथा धर्म संहिता ॥१४९॥ को लोगों को सुनाकर परथिवी पर ब्राह्मणों में विष्णु के समान मनुष्यों तथा देवताओं का पूज्य हो जाता है ॥१५०॥ तीर्थस्वरूप तथा निष्पाप उसका जो अक्षय बल होता है, उसकी अर्चना करने वाला मनुष्य उसके द्वारा भगवान् विष्णु के लोक में जाता है।॥ १५१॥ वह यदि किसी पाप को भी कभी कर लेता है तो उसका उस पाप से सम्बन्ध उसीतरह नहीं होता है, जिस तरह चाण्डाल के घर में जाने वाली सूर्य की रोशनी तथा अग्नि दूषित नहीं होती है ॥१५२॥ यज्ञ कराने से, अध्यापन करने से, वैवाहिक सम्बन्ध से, असत् प्रतिग्रह (दान) लेने से, ब्राह्मणों को पाप नहीं लगता है क्योंकि ब्राह्मण अग्नि तथा सूर्य के समान होते हैं ॥१५३॥ प्राणायाम करने वाले ब्राह्मण उन प्रतिग्रह जन्य पापों को उसी तरह नष्ट कर देते हैं जिसतरह वायु आकाशस्थ मेधों को विनष्ट कर देती है ॥१५४॥ जो ब्राह्मण प्राणायाम पूर्वक गायत्री का तथा उसके प्रत्येक अक्षरों के देवताओं का अपने अङ्गो में न्यास करके जप करता है ॥१५५॥ वह करोड़ों जन्मों के पापों से रहित होकर ब्रह्मा की पदवी को प्राप्त करके प्रकृति से परे हो जाता है ॥१५६॥ अतएव हे नारद! प्राणायाम पूर्वक गायत्री का जप करो । नारदजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! प्राणायाम कैसे होता है ? उसके प्रत्येक अक्षर के देवता कौन है 2॥१५७॥ हे तात ! उन देवताओं का अड्डों में-जैसे न्यास होता है, उसे आप मुझे क्रमशः बतलायें ब्रह्माजी ने कहा-- शरीरधारी के गुदा प्रदेश में अपान वायु तथा हृदय में प्राण वायु रहता है ॥१५८॥
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