Srishti Khanda Extracted Page 659
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-659
Sanskrit Original
श्रीपडामहापुराण व्रतैश्न विविधैः पूतो नित्यस्नानद्विजार्चनै: । मित्रामित्रे दयालुः स्यात्समः सर्वजनेषु च ॥१३५॥ परस्वं न हरेद्यस्तु तृणमप्यटवीगतम्। कामक्रोधादिनिर्मुक्त इंद्रियैरजितः पुमान् ॥१३६॥परदारान्नगृह्णाति मनसापि गृहागतान् । नारद उवाच गायत्र्या लक्षणं किं वा प्रत्येकाक्षरजं गुणम् RRS कुक्षिचरणगोत्राणां तस्य ब्रूहि सुनिश्चयम् । ब्रह्मोवाच छंदो गायत्री गायत्र्याः सवितादेवताश्रुवम् ॥१३८॥ शुक्लवर्णा त्वग्निमुखा विश्वामित्रक्रषिस्तथा । ब्रह्मणश्शिरआरूढा शिखा विष्णुहृदिस्थिता ॥१३९॥ उपनयने नियोग: स्यात्सांख्यायनसगोत्रजा। त्रैलोक्यचरणा ज्ञेया पृथिवी कुक्षिसंस्थिता ॥१४०॥ चतुर्विशतिस्थाने च पादादौ मस्तकांतके । चतुर्विशत्यक्षरं न्यस्य ब्रह्मलोकं स विंदति ॥१४९॥ प्रत्यर्णदेवतां ज्ञात्वा विष्णुसायुज्यमाघ्नुयात्। अपरं च प्रवक्ष्यामि गायत्र्या लक्षणं ध्रुवम् ॥१४२॥ सप्तपंचतथाब्रह्मयजुरष्टादशाक्षरम् । ज्वलनादिहकारांतं जलेस्थित्वा शतंजपेत् ॥९४३॥ उपपातकोट्या तु तथातिपातकैरपि। ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुक्ता यांति ममालयम् ॥९४४॥ ३2अग्नेर्वाक् पुंसि यजुर्वेदेन जुष्टात्सोमं पिब स्वाहा । विष्णुमंत्रं महामंत्रं तथा माहेश्वरस्य च ॥९४५॥ देवीसूर्यगणेशानां तथा क्रतुभुजां सुत । यस्य कस्य कुले जातो गुणवानेव तैर्गुणैः ॥१४६॥ स्नान करने से अनेक प्रकार के व्रतों को करने से तथा नित्य ही स्नान करके ब्राह्मणों की पूजा करने से पवित्र बना हुआ, शत्रुओं तथा मित्रों पर दया करने वाला, सभी मनुष्यों से एक समान व्यवहार करने वाला ॥१३४-१३५॥ जो दूसरों की सम्पत्ति को नहीं हड़पता है तथा वन में जाकर तृण भी नहीं लेता है, काम तथा क्रोध से रहित जो इन्द्रियो के वश में नहीं होता हे ॥१३६॥ अपने घर आयी हुयी दूसरों की पत्नी को मन से भी नहीं अपनाने वाला, इसतरह का ब्राह्मण पूज्यतम है । नारदजी ने कहा-- गायत्री का लक्षण क्या है ? उसके प्रत्येक अक्षरों के गुण क्या है?।।१३७॥। इस बात का निश्चय करके आप उसकी कुक्षि, चरण तथा गोत्र को बतलायें । ब्रह्माजी ने कहा-- गायत्री का गायत्री छन्द है, उसके अधिष्ठातृ देवता सविता हैं ॥१३८॥ उसका वर्ण शुक्ल है, अग्नि ही उसका मुखहै तथा उसके ऋषि विश्वामित्र है । ब्राह्मण ही उसके शिर हैं, वह आरुढ शिखा है, भगवान् विष्णु के हृदय में स्थित है ॥१३९॥ उसका उपनयन में उपयोग है, उसका सांख्यायन गोत्र है त्रैलोक्य ही उसका चरण है । वह पृथिवी की कुक्षि में स्थित है ।।१४०॥। गायत्री के चौबीस अक्षरों का शरीर के पैर से लेकर मस्तक पर्यन्त चौबीस स्थानों में न्यास करने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक में जाता है ॥१४१॥। गायत्री के प्रत्येक अक्षरों के देवता का ज्ञान प्राप्त करकेमनुष्य भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है । में गायत्री के दूसरे भी लक्षण को बतलाऊँगा ।। १४२॥ सात या पाँच वेद मंत्र का तथा अठारह अक्षरों वाले यजुष् का अग्नि देवताक अक्षर से लेकर हकार पर्यन्त का जल में खड़ा होकर सौ बार जप करे ॥१४३॥ ऐसा करने वाला करोड़ों उपपातकों, ब्रह्म हत्या आदि अतिपातकों के पापों से भी मुक्त होकर ब्रह्मलोक में जाता है ॥१४४॥ वह मन्त्र है ओम् अन्नेर्वाक् पुंसि यजुर्वेदेन जुष्टात् सोमं पिब स्वाहा हे पुत्र विष्णुमन्त्र महामंत्र है, उसी तरह का माहेश्वर मन्त्र है, देवी, सूर्य तथा गणेश तथा यज्ञीय देवताओं का
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