Srishti Khanda Extracted Page 658
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-658
Sanskrit Original
विप्रस्य लक्षणं ब्रूहि याथातथ्यं गुरोरपि । ब्रह्मोवाच पूज्य: श्रोत्रियको नित्यं सदाचारसमन्वितः ॥९२४॥ सद्वृत्तः कलुषैर्मुक्तस्तीर्थभूतो जनोऽनधः । नारद उवाच जातः कः श्रोत्रियस्तात सत्कुले वाप्यसत्कुले ॥१२५॥ सदसत्कर्मकर्ता वा कः पूज्यो भुवि बाडव: । ब्रह्मोवाच सत्श्रोत्रियकुलेजातो ह्यक्रियो नैव पूजितः ॥१२६॥ असत्क्षेत्रकुले पूज्यो व्यासवैभांडकौ यथा । क्षत्रियाणां कुले जातो विश्वामित्रोस्ति मत्सम:॥१२७॥ वेश्यापुत्रो वसिष्ठश्च अन्यो सिद्धा द्विजादय: । तस्मात्सच्छोत्रियादीनां शृणु पुत्रक लक्षणम् ॥१२८॥ धरायां तीर्थभूतानां सर्वपापहराय च । जन्मन ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर््िज उच्यते ॥१२९॥ विद्यया याति विद्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रियलक्ष्णम्। विद्यापूतो मंत्रपूतो वेदपूतस्थैव च ॥९३०॥ तीर्थस्नानादिभिमेध्यो विप्रः पूज्यतमः स्मृतः । नारायणे सदा भक्तः शुद्धांतःकरणस्तथा॥१३९॥ जितेंद्रियो जितक्रोधस्समः सर्वजनेषु च । गुरुदेवातिथेर्भक्तः पित्रोः शुश्रूषणे रत: ॥१३२॥ परदारे मनो यस्य कदाचिन्नैव मोदते। पुराणकथका नित्यं धर्माख्यानस्य संततिः॥९३३॥ अस्यैव दर्शनान्नित्यमश्वमेधादिजं फलम्। संलापे गतिमेत्यस्य भागीरथ्या प्लवस्य च ॥१३४॥ कौन सा ब्राह्मण अपूज्य होता है ?॥१२१-१२३॥ आप विप्र तथा गुरु का ठीक-ठीक लक्षण बतलायें । ब्रह्माजी ने कहा- श्रोत्रिय तथा सदाचारी ब्राह्मण नित्य ही पूज्य हैं ॥१२४॥। सदाचारी मनुष्य निष्पाप, पापों से रहित, तथा तीर्थस्वरूप होता है नारदजी ने कहा-- कौन सा ब्राह्मण श्रोत्रिय कहलाता है ? सद्वंश में उत्पन्न अथवा असद्वंश में उत्पन्न 2॥१२५॥ लोक में कौन सा ब्राह्मण सत्कर्म करने वाला तथा कौन सा असत्कर्म करने वाला होता है ? ब्रह्माजी ने कहा-- सद्वंश तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण के वंश में उत्पन्न भी ब्राह्मण यदि क्रियाहीन है तो वह पूज्य नहीं है। असद्वंश में भी उत्पन्न श्रोत्रिय ब्राह्मण उसी तरह से पूज्य होता है जैसे व्यास तथा विभाण्डक ऋषि के पुत्र शृङ्गी ऋषि। क्षत्रियो के वंश में भी उत्पन्न विश्वामित्र मेरे समान हें ॥१२६-१२७॥। उसी तरह वेश्या के पुत्र वसिष्ठ, तथा दूसरे सिद्ध द्विज आदि भी पूज्य हैं । अतएव हे पुत्र ! मैं तुम्हें श्रोत्रिय आदि का लक्षण बतलाता हूँ ॥१२८॥ जिससे कि पृथिवी पर तीर्थ स्वरूप ब्राह्मणों के द्वारा पाप का नाश हो सके । ब्राह्मण वंश में जन्म से ब्राह्मण ब्राह्मण होता है । उपनयनादि संस्कारों के द्वारा वह द्विज हो जाता है ॥१२९॥ विद्या प्राप्त करके वह विप्र बन जाता है तथा ये तीनों विशेषताएँ जिसमें हो वह श्रोत्रिय कहलाता है । विद्या, वेद तथा मंत्र से पवित्र हुए ॥१३०॥ व्यक्ति तीर्थो में स्नान करके पवित्र बनता है । ऐसा ब्राह्मण सदैव पूज्यतम होता है । जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, तथा सदा भगवान् नारायण की भक्ति करता है ॥१३१॥ जितेन्द्रिय, क्रोधहीन तथा सबों के प्रति समदर्शी आचार्य देवता तथा अतिथि का भक्त, माता-पिता की सेवा करने वाला ॥१३२॥ जिसका मन दूसरे की स्री के विषय में कभी भी मुदित नहीं होता है जो धार्मिक पुराणों की कथा करता है, ऐसे ब्राह्मण की जो सन्तान हो ॥१३३॥ उसका दर्शन कर लेने मात्र से अश्वमेध आदि याज्ञों के करने का फल होता है. । बात-चित करने से गति को प्राप्त करने वाले, गङ्गा नदी में
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