Srishti Khanda Extracted Page 657

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-657

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Sanskrit Original

विप्रपादरज: पूताः पूतास्तज्ज्लबिन्दुभिः । विपद्धिश्च सदापापै मुक्ता यांति त्रिविष्टपम् ॥१११॥ विप्रपादरजः पूता शुचयो गृहचत्वरा । पुण्यक्षेत्रसमास्ते स्युः प्रशस्ता यज्ञकर्मसु ॥१९२॥ आदौ ब्रहममुखाद्विप्र समुद्भूतः पुरानघः । वेदास्तत्रैव संजाताः सृष्टिसंस्थितिहेतवः ॥११३॥ तस्माद्विप्रमुखे वेदाश्चार्पिताः पुरुषेण हि । पूजार्थं सर्वलोकानां सर्वयज्ञार्थतो श्रुवम्॥११४॥ पितृयज्ञे विवाहे च वहिकार्येषु शांतिषु । प्रशस्तब्रा्मणा नित्यं सर्वस्वस्त्ययनेषु च॥११५॥ देवा भुंजंति हव्यानि बलिं प्रेतादयोऽ सुराः । पितरश्चैव कव्यानि विप्रस्यैव मुखाद् ध्रुवम्॥११६॥ देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च यो दद्याद्यज्ञकर्मसु । दानं होमं बलिं चैव विना विप्रेणनिष्फलम् ॥११७॥ भुंजति चासुरास्तत्र प्रेता दैत्याश्च राक्षसाः। तस्माद्वाह्मणमाहूय तेषु कर्माणि कारयेत् ॥११८॥ काले देशे च पात्रे च लक्षकोटिगुणं भवेत् । श्रद्धया च द्विजं दृष्ट्वा प्रकुर्यादभिवादनम् ॥१९९॥ दीर्घायुस्तस्य वाक्येन चिरञ्जीवी भवेन्नरः । अनभिवादनाद्दिप्रद्देषादश्रद्वया पि च॥१२०॥ आयुः क्षीणं भवेत्पुंसां भूतिनाशश्च दुर्गतिः । आयुर्वृद्धि र्यशोवृद्धि ृ द्विर्विद्याधनस्य च ॥१२१॥ पूजयित्वा द्विजान् श्रेष्ठो भवेन्नास्त्यत्र संशयः। नविप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्रप्रतिघोषितानि॥१ २२॥ स्वाहास्वधास्वस्तिविवर्जितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि । नारद उवाच कश्चपूज्यतमो विप्रो ह्यापूज्यो वाथ को भवेत् ॥९२३॥ उससे अभयत्व की प्राप्ति होती है ॥१०९॥ ब्राह्मणों की सेवा करते समय उनके तलवे को रगड़ने से जो हाथ घिसता है, उस हाथ का नाम श्रीकर है और दूसरे हाथ केवल कर्म करने वाले हैं ॥११०॥ ब्राह्मण के चरण धूलि से पवित्र बने लोग तथा ब्राह्मणों के चरणोदक से पवित्र बने मनुष्य विपत्तियों तथा पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में जाते हें॥ ११ १॥ ब्राह्मणों के चारणघूलि से पवित्र बने हुए गृह तथा चत्वर पुण्य क्षेत्र के समान यज्ञ करने के लिए प्रशस्त होते हैं ॥११२॥ ब्रह्माजी के मुख से सर्वप्रथम निष्पाप ब्राह्मण उत्पन्न हुए । ब्रह्माजी के मुख से ही सृष्टि तथा स्थिति के कारणभूत वेद भी उत्पन्न हुए ॥११३॥ इसीलिए परमात्मा ने ब्राह्मणों के मुख में ही सभी लोकों में पूजा के लिए तथा यज्ञों के लिए, वेदों को अर्पित किया ॥११४॥ पितृयज्ञ (श्राद्ध), विवाह, होम तथा शान्ति कर्मों में तथा सभी कल्याण कर्मों में ब्राह्मण प्रशस्त माने गये हैं ॥११५॥ इसलिए ब्राह्मण के ही मुख से देवता हव्य का भोजन करते हैं, प्रेत तथा असुर आदि बलि का भोग करते है तथा पितृगण कव्य का भोग करते हैं ॥११६।। यज्ञों में ब्राह्मण से भिन्न के द्वारा जो देवताओं और पितरों के लिए दान दिया जाता है, वह दान और होम निष्फल होता है ॥११७॥ ब्राह्मण से भिन्न के द्वारा कराये गये कर्म में केवल भूत प्रेत ही होमादि का भोग करते हैं । अतएव श्राद्धों तथा यज्ञो में ब्राह्मण को ही बुलाकर यज्ञादि कर्म कराना चाहिए ।।११८।। उतम देश, काल और पात्र के होने पर किए गये कर्मों का लाख गुना फल होता है । ब्राह्मण को देखकर उसको श्राद्धा पूर्वक प्रणाम करना चाहिए ॥११९॥ उस ब्राह्मण के आशीर्वाद से मनुष्य दीर्घायु होता हे । द्वेष तथा अश्रद्धा के कारण ब्राह्मण को प्रणाम नहीं करने पर॥१२०॥ आयुक्षीण होती है, धन का नाश होता है और दुर्गति होती है । श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करने से आयु की वृद्धि, यश की वृद्धि विद्या की वृद्धि और धन की वृद्धि होती है, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है । जिसके घर में ब्राह्मण के पादोदक से कभी कीचड़ नहीं होता, वेदों तथा शास्त्रों की प्रतिध्वनि नहीं होती है, कभी होम और श्राद्ध नहीं होते हैं वह घर श्मशान के तुल्य अपवित्र होता है । नारदजी ने कहा--- कोन सा ब्राह्मण पूज्यतम है तथा

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