Srishti Khanda Extracted Page 656
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-656
Sanskrit Original
लोके विप्रसमो नास्ति देवानामपि दैवतम् । स च धर्ममयः साक्षाद्धवि मुक्तिप्रदो भृशम् ॥९७॥ लोकानां स गुरुः पूज्यस्तीर्थभूतोऽनघो जनः । स वै देवालयः सत्त्वो निर्मितो ब्रह्मणा पुरा ॥९८॥ इममर्थं पुरा पृष्टो नारदेन पितामहः। कस्मिस्तु पूजिते ब्रह्मन्प्रसादी माधवो भवेत् ॥९९॥ ब्रह्मोवाच यस्य विप्राः प्रसीदन्ति तस्य विष्णुः प्रसीदति। तस्माद्वाह्मणशुश्रूषुः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१००॥ विष्णुर्ब्राह्मणदेहेषु सदा वसति नान्यथा । तस्माद्वाह्मणपूजायां विष्णुस्तुष्यति तत्क्षणात् ॥९० १॥ विप्रान्यः पूजयन्नित्यं दानमानार्चनादिभिः । कृतं क्रतुशतं तेन विध्युक्तं प्रियदक्षिणम् ॥१०२॥ ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रमनूषरमकण्टकम् । वापयेत्सर्वबीजानि सा कृषिस्सार्वकालिकी॥१०३॥ अभिगम्य तु यद्दत्तं यच्च दानं मनोरमम् । विद्यते सागरस्यांतो दानस्यांतो न विद्यते ॥९०४॥ मनसापि न हिंसंति भूदेवमाततायिनम्। मनोनुकूलतां यांति देवैरपि च दुर्लभाम् ॥९०५॥ गृहे यस्यागतो विद्वान् नैराश्यं नोपगच्छति । सर्वपापक्षयस्तस्य चाक्षयस्वर्गमश्नुते ॥१०६॥ काले देशे च पात्रे च विप्रे यच्चार्पयेद्दसु । तद्धनं चाक्षयं विद्धि जन्मजन्मनि तिष्ठति ॥९०७॥ न च दारिब्र्यतामेति नातुरो न च कातरः। मनोनुकूलां प्रमदामर्चयित्वा द्विजान् लभेत् ॥९०८॥ कृत्वा साहसकर्माणि दद्याद्विप्राय पर्वसु । तद्दानं सुगुणं प्रोक्तमभयं लाभ एव च ॥१०९॥ विप्रपादतलोदघृष्टिक्षती भवति यः करः। स करः श्रीकरो नाम अन्यः कर्मकरः करः॥९९०॥ अक्षय स्वर्ग का भोग करते हैं । राजागण पृथिवी की रक्षा करते हैं तथा धन, सुख और कल्याण प्राप्त करते हें॥९६॥ संसार में ब्राह्मण के समान कोई देवता भी पूज्य नहीं है । ब्राह्मण पृथिवी पर साक्षात् देवता हें और सर्व धर्ममय हैं । ब्राह्मण मुक्ति भी प्रदान करते हैं ॥९७॥ ब्राह्मण संसारी जीवों का साक्षात् पूज्य गुरु हैं, तीर्थ स्वरूप हैं तथा निष्पाप हैं, पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने ब्राह्मणों को सभी देवताओं के आश्रय रूप से बनाया ॥९८। इस वात को प्राचीनकाल में नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा था । हे ब्रह्मन् ! किसकी पूजा करने से श्रीभगवान् प्रसन्न होते हैं 2॥९९॥ ब्रह्माजी ने कहा-- जिस पर ब्राह्मण प्रसन्न रहते हैं, उस पर भगवान् विष्णु भी प्रसन्न रहते हें । इसीलिए ब्राह्मणों की सेवा करने वाला मनुष्य, परंब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥१००॥ भगवान् विष्णु ब्राह्मणों के शरीर में सदैव निवास करते हैं । इसीलिए ब्राह्मण की पूजा करने से विष्णु भगवान् उसी क्षण प्रसन्न हो जाते हैं ॥१०१॥ जो व्यक्ति दान-मान तथा अर्चना आदि से ब्राह्मणों की पूजा करता है, उसको विधिपूर्वक तथा पर्याप्त दक्षिणा देकर सैकड़ों यज्ञं को करने का फल प्राप्त होता है ॥१०२॥ ब्राह्मण का मुख उषर तथा कण्टक रहित खेत के समान हैं । उसमें सभी प्रकार के बीजों का वपन करना चाहिए, वही सॉर्वकालिकी कृषि हैं ॥१०३॥ ब्राह्मण के पास जाकर जो दान दिया जाता है तथा जो मनोरम दान होता है, उसके फल का अंत नहीं होता है, सागर का तो अन्त होता है ॥१०४॥ जो लोग आततायी भी ब्राह्मण की मन से भी हिंसा नहीं करते हैं, वे देवताओं को भी दुर्लभ अपने मनोऽनुकूल फल को प्राप्त करते हैं ॥१०५॥ जिसके घर में आया हुआ विद्वान् ब्राह्मण निराश नहीं होता है, उसके सारे पापों का नाश हो जाता है तथा वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥१०६॥ पुण्य देश काल में उत्तम पात्र ब्राह्मण को जो धन दिया जाता है, उस धन को अक्षय समझो, वह अनेक जन्मों तक बना रहता है ॥१०७॥ उसमें न तो कभी दरिद्रता आती है, न आतुरता और न कातरता; ब्राह्मणों की पूजा करने से मनोनुकूल पत्नी की प्राप्ति होती हैं ॥१०८॥ साहसिक कर्मो को भी करके पर्वा (संक्रान्तियो) के अवसार पर जो ब्राह्मणों को दान दिया जाता है, वह सद्गुण सम्पन्न दान है,
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