Srishti Khanda Extracted Page 655
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-655
Sanskrit Original
६३० श्रीपद्ममहापुराण प्रप्तोप्यैश्यं सर्वरक्षोगणानां पुत्रं चापि प्रोर्जितं शक्रबंधम् । भवभयहर हरपरमउदार ममसुखकरण निखिलसुरसार ॥८७॥ जितमरुदभिमत वितरणपार तव पदकमलमिहारणसार । तवेश पादपंकजं करोति यो नरो हृदि सदेशतस्य वांछितं ददासि भक्ति भावितः ॥८८॥ मुनीश्वराः पुरा हरं भवंत मेवमादरात् प्रपूज्यलिंगरूपिणं समापितामनोर थान् । भवोद्धवैकरूपिणं प्रपंचपंचकाकृतिं विचिंत्यवृक्षकोटरस्थएषजीवजीवनम् ॥८९॥ भवेद्धवाइघ्रिचिंतनाप्तसर्वकामईश्वर त्वदीयकिंकरान्विते पदे पदे समागतः । मूढोहं नाभिजानामि त्वां स्तोतुं भक्तवत्सल ॥९०॥ सदीश्वरेण मनसाप्यनुकंप्यो रणं गतः । इतिस्तुतो महेशस्तु भत्तत्र्या दैत्येन सादरम्॥९१॥ गणेशतां ददौ तस्मै नामभृंगीरिटीति च । एष ते महिमा भूप हरस्य भवहारिणः ॥९२॥ कथितो विध्नविघ्नाख्यस्तत्पराणां सुखावहः । भीष्म उवाच मनुष्यस्यापिदेवत्वं सुखं राज्यं धनं यशः ॥९३॥ जयं भोग्यं तथारोग्यमायुर्विद्यां श्रियंसुतम् । बंधुवर्गशिवं सर्व ब्रूहि मे विप्रसत्तम ॥९४॥ पुलस्य उवाच एभिर्गुणैर्युतः श्रीमान्सदैव ब्राह्मणो भुवि । त्रैलोक्ये तु सदा मेध्यो विप्रदेवो युगे युगे॥९५॥ पूजयित्वा द्विजान्देवाः स्वर्ग भुंजंति चाक्षयम्। धरामवंति राजानो लोका वित्तं सुखं शिवम्॥९६॥ दिया ॥८६॥ सभी राक्षसों का स्वामी स्वयं बनकर उसने इन्द्र को भी बान्ध लेने वाले पुत्र को प्राप्त किया । हे परम उदार शङ्कर ! मेरे दुःख को दूर कर मुझको सुख प्रदान करने वाले आप सभी देवताओं में प्रधान है ॥८७॥ अपने श्वासों पर विजय प्राप्त करने वाले, अपने भक्तों को अभिमत फल प्रदान करने वाले आपके चरण कमल इसलोक के सार स्वरूप हैं । हे ईश ! जो व्यक्ति आपके चरण कमलों का ध्यान करता है, आप उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसको वांछित फल प्रदान करते है ॥८८॥ पूर्वकाल में बड़े-बड़े मुनियों ने आदरपूर्वक लिङ्ग स्वरूप आपकी ही पूजा करके अपने मनोरथों को पूरा किया । तथा केवल संसार में उत्पन्न होने वाले पाँच आकार वाले पपञ्च का चिन्तन करने से जीव शरीर रूपी वृक्ष के कोटर में स्थित है ॥८९॥ हे ईश्वर ! आपके चरण कमलों का इस तरह चिन्तन करके मनुष्य अवाप्त समस्त काम हो जाता है और पद-पद पर आपके किंकर के पद को प्राप्त कर लेता । हे भक्त वत्सल ! मैं मूर्ख हूँ आपकी स्तुति करना नहीं जानता हूँ ॥९०। अतएव इस रण में विद्यमान आप प्रसन्नमना होकर मुझ पर कृपा करें । इस तरह उस दैत्य (अन्धक) के द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति किए जाने पर प्रसन्न होकर शङ्करजी ने उसे भृंगीरिंटी नामक गणेश बना दिया । हे राजन् ! संसार के बन्धन को दूर करने वाली भगवान् शिव को यह महिमा मैंने तुम्हें सुनायी ॥९२॥ इस स्तुति का नाम विघ्नविघ्न है । यह स्तुति स्तुति करने वालों के लिए सुखप्रद है! भीष्मजी ने कहा-- हे विप्र ! मुझे यह बतलाइये कि मनुष्य को किस तरह से देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश॥९ ३॥ जय, भोग्य, आरोग्य, आयु, विद्या, श्री, पुत्र, बान्धव और सर्वत्र कल्याण प्राप्त होता है ? इसे आप विस्तार पूर्वक बतलाइये ॥९४।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इन गुणों से युक्त, सदा ऐश्वर्य सम्पन्न ब्राह्मण त्रैलोक्य में सदैव पूज्य होता है । सभी युगों में ब्राह्मण देवता के समान पूज्य हैं ॥९५॥ ब्राह्मणों की पूजा करके ही देवता
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