Srishti Khanda Extracted Page 654
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-654
Sanskrit Original
ततोन्थकर्त्रिशूलेनाताडयत्पापकर्मकृत् । तस्मिन्युद्धे तथा रुद्रो हान्धथकेनाभिपीडितः ॥७३॥ यं नाम्ना पाशुपतं हि यत् । पिनाकमानम्यदोभ्यां पिनाकी शङ्करः स्वयम् ॥७४॥ रुद्रबाणविनिर्भेदाट्टुधिरादन्धकस्य तु । अंधकाश्च समुत्पन्नाः शतशोथ सहस्रशः ॥७५॥ तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः । बभूवुरंधकाघोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्॥७६॥ तं तु मायाविनं दृष्ट्वा देवदेवस्तदांधकम्। पानार्थमंधकस्यास्य ससृजे मातृकास्तदा ॥७७॥ माहेश्वरीं तथा ब्राह्मीं शौरी वा बाडवीं तथा | सौपर्णीमथ वायव्यां शंखिनी तैत्तिरीं तथा ॥७८॥ सौरी सौम्यां शिवदूती चामुंडामथवारुणीम् । बाराहीं नारसिंही च वैष्णवीं च विभावरीम् ॥७९॥ शतानंदां भगानंदां पिच्छिलां भगमालिनीम् । बालामतिबलां रक्तां सुरभीं मुखमंडिताम् ॥८ ०॥ मातृनंदां सुनंदां च बिडालीं शकुनीं तथा । रेवतीं च महापुण्यां तथैव शिखिपट्टिकाम् ॥८१॥ शूलेन च ततो दैत्यं बिभेद त्रिपुरांतकः । निर्गतं रुधिरं तस्मात्पपुस्ता मातरस्तदा॥८२॥ नीरक्तो हि तदा दैत्यश्शुष्कतां प्राप भूपते। शूले प्रोतस्तदा दैत्यो दिव्यवर्षसहस्रकम् ॥८ ३॥ महाबलेन रुद्रेण विधृतोपि मृतो नहि । स्तुतस्तेन तदाशंभुर्भक्त्या दैत्येन सुत्रत॥८४॥ नमोस्तु शंभो भवनाशहेतो नमोस्तु ते देववरप्रसीद । त्वं भूजलाम्नीरनभोर्कसोमऽ यज्वाष्टमूर्ति भव भावनोलम् ॥८ ५॥ त्वां वै बाणो बहुवाद्येन तोष्यप्राप्तश्चैश्यं स्वे पुरे तत्स्वरक्ष्यम् । रक्षोधीशोबाहुभिस्तोल्यशैलं युप्पत्क्रांतक्लिष्टरूपोह्णनौषीत् ॥८ ६॥ निपुण इस पापी को आप अपने त्रिशूल से परास्त कीजिए ॥७१॥ हे देवेश ! अपने त्रिशूल से इस अन्धकासुर को मारकर विजयी बनें । उसके बाद त्रिशूल लेकर तेज पूर्वक दूर से ही उसे फेंककर ॥७२॥ उस पापी अन्धकासुर पर शङ्करजी ने प्रहार किया । उस युद्ध में आन्धकासुर से पीडित रुद्र ने ॥७३॥ अपने अत्यन्त उग्र पाशुपतास्र नामक बाण से प्रहार किया पिनाकधारी भगवान् शिव ने पिनाक से उस पर पाशुपतास्तर का प्रहार किया ॥७४॥ रुद्र के बाण से निकलने वाले खून से सैकड़ों हजारों अन्धक उत्पन्न हो गये ॥७५॥ उन सबों के विदीर्ण करने से दूसरे अन्धक उत्पन्न हो गये । इसतरह भयङ्कर शिव ने अन्धकों को पी जाने के लिए मातृकाओं की सृष्टि कर दी ॥७७॥ वे मातृकाएँ ब्राह्मी, शौरी, बाडवी, सौपर्णी, वायव्यी, शङ्किनी, तैत्तिरी ॥७८॥ सौरी, सौम्या, शिवदूती, चामुण्डा, वारुणी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी, विभावरी ॥७९॥ शतानन्दा, भगानंदा, पिच्छिला, भगमालिनी, बाला, अतिबला, रक्ता, सुरभी, मुखमण्डिता ॥८०॥ मातृनन्दा, सुनन्दा, बिडाली, शकुनी, रेवती, महापुण्या तथा शिखिपट्टिका थीं॥८ १॥ उसके बाद शङ्करजी ने अन्धकासुर को त्रिशूल से छेद दिया । उससे निकले खून को मातृकाओं ने पी लिया । वह रक्त रहित हो गया । हे भीष्मजी ! रक्त रहित वह अन्धकासुर सूख गया । शूल से छिद जाने पर भी वह दैत्य मरा नहीं । उसको शङ्करजी त्रिशूल से दबाये रहे । हे सुब्रत ! उस दैत्य ने भक्ति पूर्वक शङ्करजी की स्तुति की ॥८२-८४॥ अन्धकासुर ने कहा-- हे संसार के बन्धन को छुड़ाने वाले शम्भो ! आपको नमस्कार है, हे देवश्रेष्ठ ! आप प्रसन्न हो जाइये । आप ही पृथिवी, जल, अग्नि, आकाश, सूर्य, सोम, यजमान आदि आठ शरीर वाले हैं, आप संसार का कल्याण करने वाले हैं ॥८५॥ आपको बाणासुर ने बहुत वाद्य बजाकर सन्तुष्ट कर दिया उसको आपने ईशत्व प्रदान कर दिया । उसको अपनी नगरी में ही आपने रक्ष्य बनाया । राक्षसों का स्वामी वह पर्वत को भी उठा लेने वाली भुजाओं वाले उसे, आपने अपने को भी आक्रान्त करने वाला तथा क्लेशकर रूप वाला बना
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