Srishti Khanda Extracted Page 653
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-653
Sanskrit Original
जन्मादिरोगरहितं परमं पुराणमीशं जरामरणशोक भयातिरिक्तम् । स्थूलानुभावनगणागणितं विशुद्धं वेदांतवादिभिरलं परिमन्यते यत् ॥६३॥ त्वामभ्निपुंजवपुषं तपसां निवासं याता दिवं सुचिरकालमुपास्य भक्ताः । भानो सुरासुरसमूहशिरोनिघृष्टपादारविंदयुगलामचलारुमूर्ते ॥६४॥ भूतेश भूतवरदासकृदव्ययात्मन् व्योमाइटहाससवितर्भुवनैकदीप । ऋक्साममंत्रयजुषामधिवासनाम सृष्टिस्थितिप्रलयकारणलोकपाल ॥६५॥ दीनस्य देवकृपणस्य भवे भवेमे मग्नस्य चारुदविचारमनोरथानि । शश्चद्यतीश्वरशशी करकं क घोरो त्पातोजरामरणशोकरुगांतरस्य ॥६६॥ यः प्रातः सायमिदं मध्याह्वेवा पठेच्च दीप्तांशोः । सलोक्यं याति रवेः प््ाप्रोतिधर्मार्थकामांश्च ॥।६७॥ नित्यं तस्माच्च सूर्याच्च मनसोभिहितं च यत्। नमस्ते देवदेवेश भक्तानामभयङ्कर ॥६८॥ सुब्रह्मण्यनमस्ते तु सर्वदेवनमस्कृत । तिग्मांशो वै नमस्तुभ्यं जगतश्चक्षुषे नमः ॥६९॥ प्रभाकरनमस्ते तु भानो जय जगत्पते । अनेन दनुमुख्येन पीडितो हं जगत्पते॥७०॥ किंकरोमि कथंचैनं घातयामि दिवाकर । सूर्य उवाच जय शूलेन पापिष्ठं मायाशतविशारदम् ॥७१॥ जयं प्राप्रुहि देवेश हत्वा शूलेन चांधकम् । गृह्य शूलं ततो दूरमाक्षिप्यहरतेजसा ॥७२॥ हैं ॥६१॥ हे अनन्त मूर्ते ! ध्यान परायण योगिजन ध्यान के द्वारा आपके जिस तुरीय पद का ध्यान करके रोगों से रहित शरीर धारण करके, भयभीत नहीं होते हैं, वह आपका शाश्वत अचिन्त्य अनादि एवं अनन्त ब्रह्म स्वरूप ही है।।६२॥ जिसको वेदान्ती जन, जन्मादि रोगों से (षड् विकारों से) रहित, परम प्राचीन, जरा, मरण तथा शोक के भय से रहित, स्थूल प्रभाव समूह में परिगणित तथा विशुद्ध मानते हैं ॥६३॥ हे भानो अग्नि के पुञ्ज रूपी शरीर वाले, तपस्या के आश्रय भूत आपकी दीर्घ काल तक उपासना करके भक्तजन स्वर्ग चले जाते हैं । देवता एवं असुरगण आपके दोनो चरणों पर अपना शिर पटकते रहते हैं, हे सुन्दर शरीर वाले सूर्य ! हे भूतेश (जीवों के स्वामिन्) हे जीवों को वरदान देने वाले ! अव्यय स्वरूप ! हे व्योमाइहास ! हे सम्पूर्ण लोको को प्रकाशित कने वाले एक मात्र दीप (प्रकाश) हे ऋग् ! यजुः एवं सामों के आश्रय स्वरूप, जगत् की सृष्टि, स्थिति एवं पालन करने वाले लोकपाल ॥६५॥ प्रत्येक जन्म में दीन बने हुए देवताओं में कृपण रहने वाले मेरे सुन्दर विचार युक्त मनोरव हे शाश्वत यतीश्वर ! चन्द्रमा को करने वाले, जरा, मृत्यु, शोक तथा रोगग्रस्त रहने वाले मेरे प्रति दैत्यों के उत्पात को नष्ट करें ॥६६॥ सूर्य भगवान् के इस स्तोत्र को प्रात:काल, सायंकाल तथा मध्याह्न में जो पाठ करता है वह इस लोक में धर्म, अर्थ एवं काम को प्राप्त करके मृत्यु के बाद सूर्य के सालोक्य को प्राप्त करता है ॥६७॥ वह उस सूर्य से जो भी मनोभिलिषित है उन सबों को प्राप्त कर लेता हैं ।हे देवदेवेश सूर्य ! हे अपने भक्तों को अभय बनाने वाले!।।६८॥ हे सुब्रह्मण्य, हे सर्वदेव नमस्कृत, हे तिग्मांशो ! जगत् के नेत्र स्वरूप आपको नमस्कार है ।हे प्रभाकर! आपको नमस्कार है, हे जगत्पते सूर्य आपकी जय हो । हे जगत्पते में इस दैत्यश्रेष्ठ अन्थकासुर से पीडित हूँ ॥६९-७०॥ मैं क्या करूँ ? में इसको कैसे मारू ? सूर्य ने कहा--- अनेक प्रकार की माया करे में
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