Srishti Khanda Extracted Page 652

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-652

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

सामेति सामगगणाहि मखार्थकं त्वामध्वर्यवस्त्वृगिति बह्वृचमुख्यपूगा: । त्वामेवमार्यमितिकार्यविदोधिगंतुं नागाश्च वेति पितरोप्यथ सर्वगंधम् ॥५४॥ मायेति चोपनिषदर्कषडैवदेवा मर्त्यास्तथावयमिवेह उपासतेऽमी । गंधर्वकिन्नरगणाः सहचारणैस्तु रूपं तथा च भगवन्प्रतिपद्य सत्वम् ॥५५॥ ये नार्चयंति सततं भवतोर्च्य मर्चिस्तेर्चिष्प्रतापितदिंगम्बरवित्तहीनाः । ् षुतक्षामकंठजठराघटखर्परेण भिक्षामटंति परवेश्मसु तेऽर्थहीनाः ॥५६॥ उत्फुल्लकोकनदकोशविशालनेत्र मीषद्विलासलुलिताञ्जितपिंगतारम् । कामं प्रशस्ततरसुंदरहाररम्यमुत्तुंगपीवरपयोधर भारखिन्नम् ॥५७॥ रं भोपमो रुपृ थुपी ननितंबबिंबानद्धक्वणन्मणिरणद्रशनाकलापम् । बूंद ललाटतटकोटिपटांतलंबिहेमांचलांचितमुखंकुलपालिकानाम् ॥५८॥ कांतं गृहेषु कलगद्दभाषितानां झंकारनूपुररवेण विरावितानाम् । तेषां कृशानुकरमिन्दुसमानकांतं यैरर्चितोसि भगवन्भवमोचनस्त्वम् ॥५९॥ ब्रह्मा त्वमेव हरिरस्यनिलऽनलोसि रुद्रोंतकोसि वरुणोस्यमराधिपोऽसि । सोमोसि वायुरसि भूरसिचेश्वरोसि यज्ञोसि वित्तपतिरस्यपराजितोसि ॥६०॥ ते सप्तसप्तिसुरवाहरणेन मुक्ता भूमावथेति तरसोरुतरंतरीताः । व्योमैतदंतरहितं परितो हि गत्वा गच्छंति न श्रमपद हि मनागपीमे ॥६९॥ ध्यानैकयोगनिरताश्च समाधिभावात् ध्यात्वा पदं तव तुरीयमनंतमूर्ते । मुक्तामयास्तनुभृतो न भियाभियुक्तास्तदब्रह्मशाश्वतमचित्य मनाद्यनंतं ॥६ २॥ भी यदि चरणों में नतमस्तक होते हैं तो वे भी मनुष्य अठासी वर्ष के आयु वाले हो जाते हैं ॥५३॥ सामवेदी ब्राह्मण आपकी उपासना साम रूप से, यजुर्वेदी आपकी स्तुति यज्ञ रूप से, और ऋग्वेदी आपकी उपासना ऋक् रूप से, कार्यज्ञ पुरुष तथा नाग आर्य रूप से आपको प्राप्त करने के लिए आपकी उपासना करते हैं पितृगण सर्वगन्ध रूप से आपको ही जानते हैं ॥५४॥। देवता उपनिषत् प्रतिपाद्य षडर्कदेव रूप से माया रूप से देवता और मनुष्य आपकी उपासना हमारे ही समान करते हैं । गन्धर्वगण, किन्नरगण तथा चारणगण आपको, रूप जानते हैं ॥५५॥ जो लोग आपकी अर्च्य अर्चि (ज्योति) की पूजा नहीं करते हैं वे वस्रहीन और धनहीन हो जाते हैं वे दरिद्र लोग भूख प्यास से व्याकुल होकर हाथ में खप्पर लेकर दूसरों के घर भीख माँगते चलते हैं ॥५६। विकसित कमल दल के समान बड़े-बड़े नेत्रों वाली, जिनके नेत्र थोड़े से विलास के कारण चंचल तारों वाले हैं, अत्यन्त सुन्दर हार से मनोहर तथा उन्नत एवं पुष्ट पयोधरों के भार से आक्रान्त रहने वाली, रम्भा के समान पृथु कटितटी वाली तथा मणि जटित करधनी को धारण करने वाली, जिनका मुख ललाट पर्यन्त लटकने वाले स्वर्णिम आञ्चल से मनोज्ञ रहता है ऐसी कुलपालिकाओं (कुलबधुओं) का मनोज्ञ समूह, झङ्कारमय नुपूर की ध्वनि से ध्वनित करने वाली तथा कल-कल ध्वनि से बोलने वाली रमणियों से युक्त उनका गृह मनोहर बना रहता है । जो लोग हे भगवन् ! संसार से मुक्ति प्रदान करने वाले आपकी पूजा किए रहते हैं ॥५७-५९॥ आप ही ब्रह्मा, विष्णु, वायु, अग्नि, रुद्र, यम, वरुण तथा इन्द्र हें । आप ही सोम, वायु, पृथिवी, ईश्वर, यज्ञ, कुबेर तथा अपराजित हैं ॥६०॥ भगवान् सूर्य के जो वाहन रण में मुक्त होते हैं वे वेग पूर्वक पृथिवी पर उतरते हैं, वे इस अनन्त आकाश के चारो आरे जाकर भी श्रान्त नहीं होते

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know