Srishti Khanda Extracted Page 651

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-651

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Sanskrit Original

स्तुवंति विविधैस्तोत्रै: नररूपं दिवाकरम् । अनौपम्यं जगद्व्यापि ब्रह्मविष्णुशिवात्परम् ॥४३॥ स्निग्धविद्ुमसच्छायं सिंदूरारुणसप्रभम् । प्रभासं तं तदा दृष्ट्वा पंचांगालिंगितावनिः ॥४४॥ पुनः प्रणामप्रवणं प्रणिधान पुरः सरम् । आलोक्यस्निग्धया दृष्ट्या देवदेवं त्रिलोचनः ॥४५॥ उवाच स्तिग्धगंभीरवाचा देवं शनै हर: । पूरयन्निवतेजोभिर्भगवान् भुवनत्रयम् ॥४६॥ दैत्यमायाभिपन्नानां दर्शनाकुलचेतसाम् । प्राणिनामिदमेवैकमविसंवादिदैवतम् ॥४७॥ अयमेव च संसारसागरात् सकलादपि । सत्वानुत्तारयन्देवः कर्णधारायते प्रभुः ॥४८॥ यजंतो जंतवो भक्तया यं देवं विविधाः सदा । निःश्रेयसाय कल्पंते तं नतो भास्करं विभुम् ॥४९॥ यस्तूदयाद्रिशिखरे मकुटायमानलीलागभस्तिभिरलंकुसुमप्रकाशैः । व्याप्य स्वदीधितिगणैः प्रदिशोदिशश्च देदीप्यते स सविता विभवायलोके ॥५०॥ ब्रह्ोंद्ररुद्रमरुदच्युतवह्विपाथो नाथप्रयोगनिपुणैश्च ऋृषीद्रसंधैः । श्रेयोर्थिभिः प्रतिदिनं दिवसांगरागै ् दिव्यांगरागपरिलिप्तसमस्तदेहैः ॥ ५ ९॥ पूज्यं वपुस्तव सदाप्रलये हि वेदै्गीर्भिर्विचित्रपदमंडलमंडिताभिः । ये त्वां स्तुवंति परसद्मानिसद्महीनां नित्यं प्रसारितकरा भुवि ते भवंति ॥५ २॥ ये दद्टुकुष्ठपिटिकादिभिरर्दितांगाः शीर्णत्वचः कुनखिनश्च्युतकेशनाशाः । देवेश तेपि तव पादनता भवंति सद्योद्दिरष्टशरदाकृतयो मनुष्याः ॥५३॥ थे ॥४१॥ देवता प्रसन्न हो गये उनके मुख साफ दिखायी दे रहे थे । स्कन्द आदि सभी देवता प्रोत्साहित हो गये।।४२॥ सबों ने अनेक स्तोत्रों से अनुपम, जगद् व्यापक, ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी श्रेष्ठ मनुष्य रूप धारी सूर्य की स्तुति की ॥४३॥ उन सबों ने स्निग्ध विद्रुम के समान कान्ति वाले, सिन्दूर के समान कान्ति वाले प्रकाशित होते हुए सूर्य को देखकर अपने पाँचों अंगों से पृथिवी का स्पर्श करके ॥४४॥ प्रणिधान पूर्वक प्रणाम करते हुए सूर्य भगवान् को प्रेमभरी दृष्टि से देखकर स्तुति की, देवाधिदेव शिवजी ने सूर्य की स्तुति की ॥४५॥। मधुर तथा गम्भीर वाणी से शिवजी ने कहा-- हे भगवन् ! आप तेज के द्वारा त्रैलोक्य को भरते हुए के समान हें ॥४६॥ दैत्य की माया से ग्रस्त, देखने के लिए व्याकुल चित्त बाले प्राणियों के लिए केवल सूर्य ही देवता हैं ॥४७॥ ये ही सम्पूर्ण संसार सागर से भी जीवों का उद्धार करते हैं तथा उनके कर्णधार बन जाते हैं ॥४८॥ भक्ति पूर्वक अनेक प्रकार से पूजा करने वाले जीव जिनके द्वारा मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं मैं उन भगवान् सूर्य को प्रणाम करता हूँ ॥४९॥ जो भगवान् सूर्य उदयाचल पर्वत के शिखर पर उसके मुकुट के समान सुशोभित होते हैं, अपनी किरणों के द्वारा लीला करते हैं तथा पुष्पों को विकसित करने का काम करते हैं । सभी दिशाओं और विदिशाओं में अपने किरणों से व्याप्त होकर देदीप्यमान होते हैं, वे भगवान् सविता लोक का कल्याण करें ।।५०॥ ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुद्रण, विष्णु, अग्नि, वरुण तथा प्रयोग करने में निपुण ऋषियों के समुदाय जो कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं, वे प्रतिदिन दिव्य अङ्गरागों के द्वारा अपने समस्त देह को अलङ्कृत करके ॥५१॥ पूज्य शरीर वाले प्रलय काल में, विचित्र पद समूह से अलङ्कृत वेद वाणी के द्वारा गृहहीन होने के कारण दूसरे के घर में आपकी स्तुति करते हैं । वे लोक में नित्य ही दान देने वाले बन जाते हैं ॥५२॥ दाद, कुष्ठ तथा फोड़े आदि रोगों के कारण जो लोग अपने शरीर से दुःखी रहते हैं, जिनका चमड़ा शीर्ण हो गया है, नख खराब हो गये हैं, जिनके बाल गिर गये हैं, हे देव ! वे लोग 5

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