Srishti Khanda Extracted Page 650

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-650

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Sanskrit Original

निहताश्चापि देवानां बहूनामेकता कृता । सस्फुलिंगार्चिषोवह्वेर्मुचमानः पिनाकधृक् ॥२८॥ शरैः समावृतं चक्रे अंधकं रथगं ततः । दनुनाथो रथस्थोऽथ शिथिलः शिथिलायुधः ॥२९॥ निमंत्र्य दानवान् सर्वान् स योद्धमुपचक्रमे । बहुधा तद्दलं भग्नं विविधायुधयोधिभिः ॥३०॥ युधिवीरैर्हतं देवैः स्थाणुना सख्यमाश्रितैः । दानवश्चांधकः सैन्यं भिन्नं दृष्ट्वा कृतं सुरैः ॥३१॥ आत्मानं च महेशेन निरुद्धं बाणकोटिभिः । विह्वलीभूतदेहोऽसौ धैर्यमालंब्य केवलम् ॥३२॥ पिनाकं चैव रय गृह्य रूद्रमताडयत्। पिनाकस्याभिघातेन रुद्रोभूमिमथागमत् ॥३३॥ भूमौ निपातिते देवे चलितं भुवनत्रयम्। तत्यजुः सागरा वेलां पर्वताः शिखराणि च ॥३४॥ नक्षत्राणि वियोगीनि जम्मुर्मुक्तान्यनेकशः। पतिते भुवि देवेशे अंधको गदया पुनः ॥३५॥ जघान रुषितो नागं हत्वा तं पातयद्धुवि। शिवं त्यक्त्वानागराजः प्रपलाय्यान्यतो गतः ॥३६॥ मुहूर्ताच्चेतनां लब्ध्वा उत्थितः परमेश्वरः । गृहीत्वा परशुं दिव्यं दानवं नैव पश्यति ॥३७॥ कृत्वा तु तामसीं मायां मायाशतविशारदः । तया विमोहिते देवे क्वनु वै दानवो गतः ॥३८॥ शंभो भयमथो प्राप्य किंनु पापः करिष्यति । तमसा छादिता यावद्देवाव्याकुलतां गताः ॥३९॥ संभ्रांतमानसानीकास्तदोचुः कार्यगौरवात् । एतस्मिन्नंतरे सूर्यस्तेजो रूपो व्यवस्थितः ॥४०॥ उत्तस्थौ नररूपेण कुर्वन्वितिमिरा दिशः। नष्टे तमसि हृष्टाङ्गे खद्योते प्रकटे स्थिते ॥४९॥ देवा मुदमवापुस्ते स्पष्टाननविलोचनाः । उद्दीप्तास्तु सुराः सर्वे गणाः स्कंदपुरोगमाः ॥४२॥ से दाँत कटकटाते हुए हाथ में त्रिशूल लेकर तैयार हो गये । रुष्ट अन्धकासुर ने दश करोड़ बाणों का प्रयोग करके विशाल देवसेना को समेट दिया । अनेक देवता मारे गये । उसके बाद भगवान् शिव ने भी अग्नि की चिनगारी युक्त बाणों के द्वारा अन्धकासुर के रथ को ढँक दिया । रथ पर बैठा हुआ अन्धकासुर शिथिलायुध हो गया वह स्वयं भी शिथिल पड़ गया ॥२७-२९॥ दानवों को युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करके वह युद्ध करने लगा । अनेक प्रकार के आयुधों से युद्ध करने वाले वीर देवताओं के द्वारा उसकी सेना भाग चली ॥३०॥ शङ्करजी से मित्रताप्राप्त देवताओं ने उसके अनेक वीरों को मार दिया । मरी जानकर देवताओं के द्वारा अपनी सेना को विदीर्ण देखकर।।३ १॥ तथा महेश के द्वारा करोड़ो बाणों से अपने को निरुद्ध देखकर अन्धकासुर का शरीर विहल हो गया । वह केवल धैर्य धारण किए हुए था ॥३२॥ उसने रुद्र के पिनाक को लेकर शङ्करजी के ऊपर उसे प्रहार किया । पिनाक के प्रहार से शङ्करजी पृथिवी पर गिर पड़े ॥३३॥ भगवान् शिव के पृथिवी पर गिरने से त्रैलोक्य काँप गया । सभी सागरों में तूफान आ गया पार्वत काँपने लगे ॥३४॥ सभी नक्षत्र वियुक्त होकर अलग-अलग हो गये । भगवान शिव के गिर जाने पर अन्धकासुर ने क्रुद्ध होकर अपनी गदा से ॥३५॥ नागराज पर प्रहार किया और नागराज भी पृथिवी पर गिर पड़े शिव को छोड़कर नागराज भागकर दूसरी ओर चले गये ॥३६॥ मुहूर्त भर के बाद होश में आकर भगवान् शिव उठ गये । उन्होंने अपने हाथ में दिव्य फरसा उठा लिया; किन्तु उस समय अन्धकासुर दिखायी नहीं पड़ा ॥३७॥ माया करने में निपुण उसने तामसी माया फैला दी । उस माया से मोहित होकर शिवजी सोचने लगे कि वह दानव कहाँ गया 2॥३८॥ उन्होंने कहा कि वह पाप मुझको प्राप्त करके क्या कर लेगा ? उस समय अन्धकाराच्छन्न होने के कारण सभी देवता व्याकुल हो गये ॥३९॥ वे घबराये हुए थे कार्य की महत्ता को देखकर वे आपस में बातें कर रहे थे । उसी समय भगवान् सूर्य ने अपना तेजोमय रूप धारण कर लिया ॥४०॥ सारी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए वे मनुष्य के रूप में प्रकट हो गये । अन्धकार के नष्ट हो जाने पर जब कि भगवान् सूर्य प्रकट विद्यमान

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