Srishti Khanda Extracted Page 649
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-649
Sanskrit Original
विभेमि तस्य पुत्रोऽद्य मया युधि निपातितः । तद्यावन्न स जानाति हतं पुत्रं महासुरः ॥१३॥ तावत्तत्रस्थ एवाशु हन्यतां मद्भयावहः । स्त्रीलौल्याद्दानवः क्रूरः परभार्यापहारकः ॥१४॥ सर्वथा घातनीयस्ते भवता सुरसत्तम । शक्रस्यैव वचः श्रुत्वा शरण्यः शङ्करस्तदा ॥१५॥ ददावभयमेवासौ मा भैरिति शतक्रतोः । दत्ताऽभयोथ कैलासादाजगाम कुशस्थलीम् ॥१६॥ ` वृतोभूतगणैरीशो वधार्थमंधकस्य तु । कृत्वा रूपं महाकायं विश्वरूपं सुभैरवम् ॥१७॥ सर्पैंज्वलद्धिर्धावद्धि भीमं भीमभुजंगवत्। जटासटाभिराकाशं फणिरत्नशिखार्चिषा॥१८॥ दहन्नतीवतेजोभिः कालाग्निरिव संक्षये। मुखैर्दष्ट्रांकुरांकैश्रच द्वितीयेन्दुकलोज्ज्वलैः ॥१९॥ पातालोदरूपाभै भैरवारावनादिभिः । भुजैरनेकसाहस्रै बहुशस्त्रकृतग्रहः ॥२०॥ बह्वाभरणभूषाढ्यै रणे धोरनिनादिभिः । सिंहचर्मपरीधानं व्याघ्रत्वमुत्तरीयकम् ॥२१॥ गजाजिनकृताटोपं पतद्धंगरवाकुलम् । ईदृग्रूपं विधायेशो दनुदैत्यभयावहम् ॥२२॥ अवातरन्महीं भीमो दनूनां क्षयकारकः । अंधासुरोऽपि दनुजः पुत्रं श्रुत्वा हतं युधि ॥२३॥ क्रोधेन तमसाविष्टो रणतूर्याण्यचोदयत् । संहत्यावहितः प्राप्तो यत्र ते त्रिदशाः स्थिताः ॥२४॥ महत्याऽसेनया सार्ध रथवारणयुक्तया। ते देवा दानवान्वीक्ष्य महाहवकृतादरान् ॥२५॥ व्यपयाततनुत्राणाः शंभुं शरणमन्वयुः । माभैरिति च तान् देवो देवानुक्त्वा त्रिलोचनः॥२६॥ गृहीत्वा शूलमातिष्ठद्ष्ट्रारवधरोरुषा । अंधकेनाथरुष्टेन शतकोटिशरैर्गणाः॥२७॥ करके।। ११। भयभीत होकर सहस्रो नेत्रों वाले इन्द्र ने शङ्करजी से कहा इन्द्र ने कहा-- हे देव ! मुझे अन्धकासुर से अभय बना दीजिये ॥१२॥ मै। इसलिए डर रहा हूँ कि आज युद्ध में मैने उसके पुत्र कनक को मार दिया है । अतएव जब तक वह अपने मरे हुए पुत्र को नहीं जानता है ॥१३॥ उससे पहले ही मुझको भयभीत करने वाले अन्धकासुर का आप वध कर दें । वह क्रूर दानव स्री का लोभी है तथा दूसरे की पत्नी का हरण करता है ॥१४॥ अतएव हे देवश्रेष्ठ ! वह आपके द्वारा मार दिए जाने योग्य है । इन्द्र की वाणी को सुनकर शरण्य भगवान् शिव ने कहा ॥१५॥ शङ्करजी ने कहा-- इन्द्र डरो मत, मैं तुम्हें अभय बना रहा हूँ । अभय प्राप्त करके इन्द्र कैलास से कुशस्थली चले गये ॥१६॥ भूतगणों के साथ भगवान् शिव भी अन्धकासुर का वध करने के लिए, अपना भयङ्कर विश्वरूप विशालकाय शरीर बनाकर ॥१७॥ देदीप्यमान, दौड़ने वाले सर्पो के द्वारा समान भयङ्कर फणि (सर्प) रूपी रत्न की कान्ति से तथा जटाओं से आकाश को जलाते हुए के समान प्रलयकाल में उद्भूत होने वाली कालाग्नि के समान तेज के द्वारा, देदीप्यमान, दूसरी चन्द्रमा की कला के समान चमकते मुख के दाँतों द्वारा पाताल के समान, अत्यन्त भयङ्कर ध्वनि आदि के कारण अनेक हजार हाथों में अनेक शस्रों को धारण करके युद्ध में घोर ध्वनि करने वाले अनेक प्रकार के आभूषणों द्वारा आकाश को मानो जलाते हुए ॥१८-२०॥ सिंह के चमडे का परिधान धारण करके व्याघ्र के चमड़े को उत्तरीय बनाकर जिस पर भौरें गुंजार कर रहे थे ऐसे गजासुर के चमड़े को ओढकर तथा दैत्यों को भयभीत करने वाला रूप धारण करके भगवान् शिव पृथिवी पर आये ॥२१-२२॥। भगवान् शिव का यह रूप दानवों का विनाश करने वाला था । अन्धकासुर ने भी अपने पुत्र के बध की बात सुनकर ॥२३॥ क्रोधान्ध हो गया और रण के बाजे को बजवा दिया । वह अपनी सेना एकत्रित करके वहाँ आया जहाँ देवता एकत्रित थे ॥२४॥ उसकी रथ और हाथी से युक्त सेना विशाल थी, महान् युद्ध करने वाले दानवों की मेना को देखकर देवगण अपना कवच खोलकर भगवान् शिव के शरण में गये । भगवान् शिव ने देवताओं से कहा डरो मत ॥२५-२६॥ वे क्रोध
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