Srishti Khanda Extracted Page 648
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-648
Sanskrit Original
छियालिसवाँ अध्याय श्रीभीष्म उवाच नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण त्वयेरितं । तथा भवस्य माहात्म्यं भैरवस्याभि्ीयताम् ॥१॥ पुलस्त्य उवाच तस्यापि देवदेवस्य शृणु त्वं कर्म चोत्तमं । आसीद्दैत्योधको नामभिन्नांजनचयोपमः ॥२॥ तपसा महता युक्तो ह्यवध्यस्त्रिदिवौकसाम्। स कदाचिन्महादेवं पार्वत्या सहितं विभुम् ॥३॥ क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तृ देवीं प्रचक्रमे। एतां देवीं हराम्यद्य वियोगे मृत्युमेष्यति ॥४॥ ततः स्थिरा भवित्री मे भार्यैषा लोकसुंदरी। बिबौष्ठं चारुवदनं चारुकांततरं मुखम् ॥५॥ यद्येषा न भवेद्धार्या जीविते किं प्रयोजनम्। एतां मतिमथास्याय मंत्रिभिः सह मंत्र्य च ॥६॥ चक्रे योगं स सैन्यस्य सेनापतिमभाषत । आनयस्व रथं मह्यं जैत्रं देवनिपातनम् ॥७॥ जयिष्ये त्रिदशान् सर्वान् विष्णुरुद्रपुरोगमान् । हरिष्ये पर्वतसुतां तया मेऽपहृतं मनः ॥८॥ मंत्रिणा तस्य चाख्यातः कनकस्य वधस्सुरैः । परभार्यानुरक्तस्य कृता देवैः सवासवैः ॥९॥ ततः कोपपरीतात्मा हन्मि देवान्सशंकरान्। तं हत्वा दानवं शक्रो भयादंधासुरस्य च॥९०॥ जगाम शरणान्वेषी कैलासं शङ्करालयम् । दृष्ट्वा प्रणम्य देवेशं चंद्रार्डकृतशेखरम् ॥११॥ भीतो विज्ञापयामास धृतसाहस्नलोचन: । अभयं देहि मे देव दानवादंधकादहम् ॥१२॥ अन्यकासुर की कथा, शङ्करजी तथा अन्थकासुर का युद्ध, शिवजी द्वारा आदित्य की स्तुति, अन्थकासुर द्वारा शिवजी की स्तुति, ब्रह्माजी द्वारा ब्राह्मणों का प्राशास्त्य वर्णन, गायत्री का माहात्म्य वर्णन और गायत्री न्यास विधि का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- आपने नरसिंह भगवान् की महिमा का विस्तार पूर्वक वर्णन किया, इसी प्रकार भयङ्कर शिवजी की महिमा का आप वर्णन करें ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- आप शङ्करजी के भी उत्तम कार्य का वर्णन सुनें । गाढे काले वर्ण का अन्धकासुर नामक दैत्य था ॥२॥ वह घोर तपस्या को करके देवताओं के लिए अवध्य हो गया उसने एक वार पार्वतीजी के साथ क्रीडा करते हुए महादेव शिवजी को देखा ॥३॥ उसी समय क्रीडा करते हुए शङ्करजी को देखकर पार्वतीजी का हरण करने की योजना उसने बनायी । यदि मैं आज इस देवी का हरण कर लेताहूँ तो इसके वियोग में शङ्कर मर जायेंगे ॥४॥ उसके बाद यह लोकसुन्दरी पार्वती स्थिर रूप से मेरी पत्नी बन जायेगी । इसके ओष्ठ विम्बाफल के समान सुन्दर तथा कान्ति सम्पन्न मुख अत्यन्त सुन्दर है ॥५॥ यह मेरी पत्नी न बने तो मुझे अपने जीवन से क्या लाभ है ? इस तरह से निश्चय करके उसने अपने मन्त्रियों के साथ विचार किया॥६॥ उसने अपने सेनापति से सेना जुटाने के लिए कहा उसने कहा-- देवताओं को मारने वाले मेरे जेत्ररथ को लाओ ॥७॥ मै विष्णु, रुद्र आदि सभी देवताओं को जीत लूँगा । मैं पार्वती का हरण करूँगा, उसने मेरे मन का हरण कर लिया है ॥८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- मन्त्री ने कहा कि दूसरे की पत्नी से प्रेम करने वाले कनक का इन्द्र आदि देवताओं ने वध कर दिया था ॥९॥ उसके बाद क्रोध करके अन्धकासुर ने कहा मैं शङ्कर आदि देवताओं का बघ करूँगा । उस कनकासुर को मारकर इन्द्र अन्धकासुर के भय से ॥१०॥ अपने रक्षक का अन्वेषण करते हुए शङ्करजी के यहाँ कैलास पर्वत पर चले गरे । इन्द्र ने चन्द्रार्दमोलि शङ्करजी का दर्शन करके तथा प्रणाम
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