Srishti Khanda Extracted Page 647

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-647

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण ु ष्टुवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम् । यत्त्वया विधृतं देवनारसिंहमिदं वपुः ॥१८८॥ एतदेवार्चयिष्यंति परापरविदो जना: । ब्रह्मोवाच भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेद्रो देवसत्तमः ॥९८९॥ भवान्कर्त्ता विकर्त्ता च लोकानां प्रभवोऽव्ययः । परां चसिद्धिं च परंच सत्वं परं रहस्यं परमं हविश्च ॥१९०॥ परं च धर्म परमं यशश्च त्वामाहुरम्र्यं परमं पुराणम् । परं च सत्यं परमं तपश्च परं पवित्रं परमं च मार्गम् ॥१९२॥ परं च यज्ञं परमं च होत्रं त्वामाहुरग्र्यं परमं पुराणम् । परं शरीरं परमं च ब्रह्म परं च योगं परमां च वाणीम् ॥१९२॥ परं रहस्यं परमां गतिं च त्वामाहुरम्रं परमं पुराणम् । एवमुक्त्वा तु भगवान्सर्वलोकपितामहः ॥१९३॥ स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यंतीष्वप्सरःसु च ॥१९४॥ क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः। नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमान्॥९९५॥ पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः । अष्टचक्रेण यानेन भूतियुक्तेन भास्वता ॥१९६॥ अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान्प्रभुः ॥१९७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे नरसिंहप्रादुर्भावो नाम पंचचत्वारिशत्तमोऽध्यायः ।४५॥ — re महासागर हिरण्यकशिपु का विनाश हो जाने से प्रसन्न हो गये । उसके पश्चात् प्रसन्न हुए देवता,ऋषिगण, सभी तपस्वी १८७।। आदि सनातन देव श्रीभगवान् के दिव्य नामों से उनकी स्तुति किए और कहे हे देव ! आपने जो यह नरसिंह रूप धारण किया है ॥१८८॥ आपके इस परात्पर रूप को जानने वाले महापुरुष आपके इसी रूप की पूजा करते हैं । ब्रह्माजी ने कहा-- हे देवश्रेष्ठ ! आप ही, ब्रह्मा, रुद्र तथा इन्द्र स्वरूप हैं ।।१८९।। आप ही लोकों के कर्ता और विकर्ता हैं । आप ही लोकों की उत्पत्ति और संहारस्थल हैं । आप ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धि, परंसत्त्व, सर्वश्रेष्ठ रहस्य तथा सर्वश्रेष्ठ हविष्य हैं ॥१९०॥ ऋषियों ने आपको ही परंधर्म, परमयश और सर्वश्रेष्ठ पुराण बतलाया है । परंसत्य परमतप, परं पवित्र, सर्वश्रेष्ठ मार्ग ॥१९१॥ सर्वश्रेष्ठ यज्ञ, परंहोत्र, तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण आपको ही कहा गया है । परं शरीर, परं ब्रह्म, परंयोग तथा परमा वाणी ॥१९२॥ परंरहस्य, परंगति (प्राप्य) तथा परंपुराण आपको ही ऋषियों ने बतलाया है । इसतरह से कहकर सर्वलोक पितामह ब्रह्माजी भगवान् नारायण की स्तुति करके ब्रह्मलोक में चले गये । उसके बाद जब तुर्य बज रहे थे, अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं ॥१९४॥ उसी समय भगवान् क्षीर सागर के उत्तर तट पर गये । अत्यन्त देदीप्यमान श्रीभगवान् अपने नरसिंह शरीर को वहीं पर स्थापित करके ॥१९५॥ अपना पुराना रूप धारण करके भगवान् गरुडध्वज ऐश्वर्य सम्पन्न चमकते हुए आठ चक्रो वाले विमान से चले गये ॥१९६॥ दिव्य गुण सम्पन्न, अव्यक्त प्रकृति वाले श्रीभगवान् अपने स्थान पर चले गये । इस तरह श्रीपदमहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के नरसिंहप्रादुर्भाव नामक पैतालीसकें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ४५।। A

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