Srishti Khanda Extracted Page 646

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-646

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Sanskrit Original

मृष्टिखण्ड ६२१ प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्। यस्मिन्नुवास दुष्टात्मा नरको नाम दानवः॥९७३॥ मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगंभीरनिस्स्वनः। षष्टिस्तत्रसहसतराणि पर्वतानां विशांपते ॥१७४॥ तरुणादित्यसंकाशो मेरुश्चैव महानिरिः । यक्षराक्षसगंधर्वै र्नित्यं सेवितकंदरः ॥१७५॥ हेमगर्भो महासेनस्तथामेधसखो गिरिः । कैलासश्चैव शैलेंद्रो दानवेंद्रेण कंपित: ॥१७६॥ हेमपुष्करसञ्छन्नं तेन वैखानसं सरः। कंपितं मानसं चैव हंसकारंडवाकुलम् ॥१७७॥ त्रिशृंगः पर्वतश्रेष्ठः कुमारी च सरिद्दरा। तुषारचयसंच्छन्नो मदंर श्चापि पर्वतः ॥१७८॥ उशीरबीजश्चगिरिद्रप्रस्थस्तथाद्रिराट् । प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः ॥१७९॥ देवाभः पर्वतश्चैव तथावै वालुकागिरिः । क्रौंच: सप्तर्षिशैलश्च धूम्रबर्णश्च पर्वतः ॥९८०॥ एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा। नद्यः ससागराः सर्वाः दानवेनाभिकंपिताः ॥१८१॥ कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्च प्रकंपितः | खेचराश्च निशा पुत्राः पातालतलवासिनः ॥१८२॥ गणस्तथा परोरौद्रो मेघनामांकुशायुधः । उद्धर्वगो भीमवेगश्च सर्व एतेभिकंपिताः ॥१८३॥ गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तथा । जीमूतघननिघोंषो जीमूत इव वेगवान् ॥१८४॥ देवारि दितिजो दृप्तो नृसिंहं समुपाद्रवत् । स तु तेन ततस्तीक्ष्णै्मृगेद्रेण महानखैः॥१८५॥ तदोङ्कारसहायेन विदार्यनिहतो युधि । मही च कालश्च शशी नभश्च ग्रहास्ससूर्याश्च दिशश्च सर्वाः ॥९८६॥ नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात् । ततः प्रमुदिता देवा त्रइषयश्च तपोधनाः ॥९८७॥ पारियात्र पर्वत, चक्रवान् पर्वत तथा ५तिं में श्रेष्ठ वाराह पर्वत वो भी कॅपा दिया ॥१७२॥ जिसमें दुष्ट नरकासुर रहता था उस सुवर्णमय प्राग्ज्योतिषपुर को भी उसने कँपाया ॥१७३॥ पर्वतश्रेष्ठ मेघ, जिसमें साठ हजार पर्वतों का सन्निवेश है, उसको भी मेघ के समान गम्भीर ध्वनि वाले हिरण्यकशिपु ने कँपा दिया ॥१७४॥ जिसकी कन्दरा में यक्ष, राक्षस तथा गन्धर्वो का निवास है, उस मध्याह्न सूर्य के समान कान्ति वाले, सुमेरु पर्वत को भी उसने कँपा दिया ॥१७५॥ उस दानवेन्द्र ने सुवर्ण जिसके भीतर है, उस महासेन पर्वत, मेघसख पर्वत तथा पर्वत श्रेष्ठ कैलास को भी कँपा दिया ॥१७६॥ उसने स्वर्णिम कमल से भरे हुए वैखानस सरोवर तथा हंसों एवं कारण्डव पक्षी से परिपूर्ण मानसरोवर को भी कँपा दिया ॥१७७॥ उस समय त्रिकूट पर्वत, नदी श्रेष्ठ कुमारी तथा वर्फ से ढँके रहने वाले मन्दराचल भी काँप उठा ॥१७८॥ उशीरबीज पर्वत, पर्वतराज भद्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, तथा पुष्कर पर्वत भी काँप गया ॥१७९॥ देवाभ पर्वत, बालुकागिरि, क्रोंच पर्वत सप्तर्षिपर्वत तथा धूम्रवर्ण पर्वत भी काँप गये ॥१८०॥ ये सभी तथा दूसरे पर्वत तथा देश एवं जनपद, नदियाँ, एवं सभी सागर दानवेन्द्र हिरण्यकशिपु के द्वारा कँपा दिए गये ॥१८१॥ कपिल, पृथिवी पुत्र व्याप्रवान भी काँप उठा । आकाशचारी रात्रि के पुत्र, पाताल में रहने वाले॥१८२॥ गण तथा अत्यन्त भयङ्कर उर्ध्वगामी, तथा भयङ्कर वेग मेघ नामक अंकुशायुध भी काँप गया ।।१८३॥ भयङ्कर हिरण्यकशिपु हाथ में गदा तथा त्रिशूल लेकर मेघ के समान गर्जना करता हुआ, मेघ के समान वेगवान् ॥१८४॥ दृप्त देवताओं का शत्रु वह दैत्य भगवान् निसृह की ओर दौड़ा, उसी समय भगवान् नृसिंह के द्वारा तीध्ण तथा बड़े- बड़े नखों द्वारा ॥१८५।। ओङ्कार की सहायता ( ओङ्कार का उच्चारण करके) भगवान् ने उसे चिर फाड़कर युद्ध में मार दिया । उस समय, पृथिवी, काल, चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रह सभी दिशाएँ ॥१८६॥ नदियाँ, पर्वत तथा

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